मुक्तक - अश्विनी उम्मीद लखनवी


जबसे देखा हाल बेचारी बिरहन का
रो रोकर के हाल बुरा है दरपन का
अब तक इतनी बार कलाई पकड़ी है
नाप बता सकता हूँ उसके कंगन का
 
ये   मेरा   इल्म   तेरे   जोश  पे   भारी  पड़ेगा
हमेशा   होश   ही   मदहोश   पे भारी  पड़ेगा
बहुत धीरे सही मंज़िल की जानिब बढ़ रहा हूँ
मैं  वो  कछुआ हूँ जो खरगोश पे भारी पड़ेगा
 
मसर्रत  से  भरे  पल     रहे  हैं
मेरे हक़  में  मुसलसल आ रहे  है
मेरी बरसों की मेहनत का नतीजा
मेरे  भी  पेड़  पे  फल    रहे  हैं
 
इसका  हल देने  में  थोड़ा  डरता है
उसको भी लगता है इसमें ख़तरा है
A. I.   से  पूछा   कैसे   इश्क़  करें
बोला  इससे  दूर रहो तो  अच्छा है

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