1 जून 2014

दो गीत - किशन सरोज

0581 541004

कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्रसारे चित्रतुम निश्चिन्त रहना

धुंध डूबी घाटियों के इंद्रधनु तुम
छू गए नत भाल पर्वत हो गया मन
बूंद भर जल बन गया पूरा समंदर
पा तुम्हारा दुख तथागत हो गया मन
अश्रु जन्मा गीत कमलों से सुवासित
यह नदी होगी नहीं अपवित्रतुम निश्चिन्त रहना

दूर हूँ तुमसे न अब बातें उठें
मैं स्वयं रंगीन दर्पण तोड़ आया
वह नगरवे राजपथवे चौंक-गलियाँ
हाथ अंतिम बार सबको जोड़ आया
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया वे पुराने मित्रतुम निश्चिंत रहना

लो विसर्जन आज वासंती छुअन का
साथ बीने सीप-शंखों का विसर्जन
गुँथ न पाए कनुप्रिया के कुंतलों में
उन अभागे मोर पंखों का विसर्जन
उस कथा का जो न हो पाई प्रकाशित
मर चुका है एक-एक चरित्रतुम निश्चिंत रहना




धर गये मेंहदी रचे दो हाथ
जल में दीप
जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन

बांचते हम रह गये अन्तर्कथा
स्वर्णकेशा गीतवधुओं की व्यथा
ले गया चुनकर कमल कोई हठी युवराज
देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन

जंगलों का दुखतटों की त्रासदी
भूल, सुख से सो गयी कोई नदी
थक गयी लड़ती हवाओं से अभागी नाव
और झीने पाल सा हिलता रहा मन

तुम गये क्या, जग हुआ अंधा कुँआ
रेल छूटी, रह गया केवल धुँआ
गुनगुनाते हम, भरी आँखों फिरे सब रात
हाथ के रूमाल सा हिलता रहा मन
सौजन्य : मोहनान्शु रचित

3 टिप्‍पणियां:

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  2. किशन दादा को जब भी पढ़ता हूँ हर बार उनके गीत नए लगते हैं नितांत मौलिक प्रतीक अद्भुत बिम्ब क्या कहने

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  3. भाई किशन सरोज के दोनों गीत बहुश्रुत और पूर्वपरिचित हैं एवं श्रेष्ठ गीतकविता की बानगी देते हैं| आपको और 'रचनाकार' को मेरा हार्दिक अभिनन्दन इन गीतों को शामिल करने के लिए|

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