1 February 2014

दश्त में ख़ाक़ उड़ा रक्खी है - शकील जमाली

दश्त में ख़ाक उड़ा रखी है
यार ने धाक जमा रखी है

आप समझाइए मायूसी को
हमने उम्मीद लगा रखी है

कौन खता था के मर जाऊंगा
मेज़ पे अब भी दवा रखी है

मुझको दीमक नहीं लग पायेगी
जिस्म को धुप दिखा रखी है

चैन से बैठ के खा सकता हूँ
इतनी इज्ज़त तो कमा रखी है

लडखडाता हूँ मैं कमजोरी से
वो समझता है लगा रखी है

इश्क करने को तो कर सकते हो

ताक पर रस्म-ऐ-वफा रखी है

शकील जमाली

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22

1 comment:

  1. वाह जमाली साहब आपकी इस गजल ने तो धाक जमा दी, बहुत बधाई आपको इस मानीखेज गजल के लिए।

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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