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ग़ज़ल - मैं दर्दो अज़ीयत की तलबगार नहीं हूँ - सपना एहसास


  मैं दर्दो अज़ीयत की तलबगार नहीं हूँ

सो जिन्स-ए-महब्बत की ख़रीदार नहीं हूँ

 

ख़ुद अपने ही हाथों से किया तर्के-त’अल्लुक़

अब छोड़ दिया उसको तो नादार नहीं हूँ