ग़ज़ल - मैं दर्दो अज़ीयत की तलबगार नहीं हूँ - सपना एहसास


  मैं दर्दो अज़ीयत की तलबगार नहीं हूँ

सो जिन्स-ए-महब्बत की ख़रीदार नहीं हूँ

 

ख़ुद अपने ही हाथों से किया तर्के-त’अल्लुक़

अब छोड़ दिया उसको तो नादार नहीं हूँ 

 

मैं दिल की अलालत को छुपाती हूँ सभी से

मैं ये भी नहीं कहती कि बीमार नहीं हूँ

 

उल्फ़त में ग़ुलामी मेरा शेवा तो नहीं है

लब-बस्ता हूँमैं नाज़ की बरदार नहीं हूँ

 

इंसान की फ़ितरत में है पोशीदा उदासी

अफ़सुर्दा तो हूँज़ीस्त से बेज़ार नहीं हूँ

 

हर राह से मंज़िल से तो महरूम हूँ मौला

लेकिन मैं तेरी ज़ात का इंकार नहीं हूँ

 

इक शम्अ हूँ और काम है ज़ुल्मत को हराना

हो जाऊँ मैं गुलऐसी भी फ़नकार नहीं हूँ

 

जो क़र्ज़ थे मुझ पर वो चुका डाले हैं मैंने

तो अब मैं किसी की भी र’वादार नहीं हूँ

 

तनक़ीद-ए-जहाँ सुन के भी तस्कीन है ‘सपना’

मैं अपनी नज़र में तो गुनहगार नहीं हूँ

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