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कविता - श्रापित खण्डहर - अनामिका प्रवीण शर्मा

 


किसी दिन

किसी कविता में

मैं लिखूँगी उन तमाम औरतों की जीवनी

जो नज़रबंद थीं

इन  ऊँची ऊँची

किलों की दीवारों के पीछे