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ग़ज़ल - सदमात हिज्रे-यार के जब जब मचल गए - अजय 'अज्ञात'


 

सदमात हिज्रे-यार के जब जब मचल गए 

आँखों से अपने आप ही आँसू निकल गए 

 

मुश्किल नहीं था वक़्त की ज़ुल्फ़ें संवारना

तक़दीर की बिसात के पासे बदल गए