रंगोत्सव की शुभकामनायें
होली के मौक़े पर आप सभी को गुदगुदाने के लिये एक हज़ल। ये हज़ल पंकज सुबीर जी द्वारा आयोजित तरही मुशायरे के लिये कही है।
घड़ी में याँ ठुमकता है घड़ी में वाँ मटकता है
मेरा महबूब है या कोई बे-पैंदे का लोटा है
मेरा महबूब है या कोई बे-पैंदे का लोटा है
वो हथिनी है तो है, पर उस का चेहरा चाँद जैसा है
वो जब साहिल पे चलती है, समंदर भी उछलता है
वो जब साहिल पे चलती है, समंदर भी उछलता है