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दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - पंकज सुबीर [९]

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर भिवादन और होली की अग्रिम शुभकामनाएँ

आज के इस सत्र में सिर्फ़ एक ही कवि को पढ़ेंगे हम लोग| इनका परिचय देना सूर्य को दिया दिखाने के समान होगा| वो क्या हैं, सभी जानते हैं, और उन्होने क्या भेजा है आइए अब पढ़ते हैं उसे|



1
बरसाने बरसन लगी, नौ मन केसर धार ।
ब्रज मंडल में आ गया, होली का त्‍यौहार ।।

2
लाल हरी नीली हुई, नखरैली गुलनार ।
रंग-रँगीली कर गया, होली का त्‍यौहार ।।

3
आंखों में महुआ भरा, सांसों में मकरंद ।
साजन दोहे सा लगे, गोरी लगती छंद ।।

4
कस के डस के जीत ली, रँग रसिया ने रार ।
होली ही हिम्‍मत हुई, होली ही हथियार ।।

5
हो ली, हो ली, हो ही ली, होनी थी जो बात ।
हौले से हँसली हँसी, कल फागुन की रात ।।

6
होली पे घर आ गया, साजणियो भरतार ।
कंचन काया की कली, किलक हुई कचनार ।।

7
केसरिया बालम लगा, हँस गोरी के अंग
गोरी तो केसर हुई, साँवरिया बेरंग ।।

8
देह गुलाबी कर गया, फागुन का उपहार ।
साँवरिया बेशर्म है, भली करे करतार ।।

9
बिरहन को याद आ रहा, साजन का भुजपाश।
अगन लगाये देह में, बन में खिला पलाश ।।

10
साँवरिया रँगरेज ने, की रँगरेजी खूब ।
फागुन की रैना हुई, रँग में डूबम डूब।।

11
सतरंगी सी देह पर, चूनर है पचरंग ।
तन में बजती बाँसुरी, मन में बजे मृदंग ।।

12
जवाकुसुम के फूल से, डोरे पड़ गये नैन ।
सुर्खी है बतला रही, मनवा है बेचैन ।।

13
बरजोरी कर लिख गया, प्रीत रंग से छंद ।
ऊपर से रूठी दिखे, अंदर है आनंद ।।

14
होली में अबके हुआ, बड़ा अजूबा काम ।
साँवरिया गोरा हुआ, गोरी हो गई श्‍याम ।।

15
कंचन घट केशर घुली, चंदन डाली गंध ।
आ जाये जो साँवरा, हो जाये आनंद ।।

16
घर से निकली साँवरी, देख देख चहुँ ओर ।
चुपके रंग लगा गया, इक छैला बरजोर ।।

17
बरजोरी कान्‍हा करे, राधा भागी जाय ।
बृजमंडल में डोलता, फागुन है गन्नाय ।।

18
होरी में इत उत लगी, दो अधरन की छाप ।
सखियाँ छेड़ें घेर कर, किसका है ये पाप ।।

19
कैसो रँग डारो पिया, सगरी हो गई लाल ।
किस नदिया में धोऊँ अब, जाऊँ अब किस ताल ।।

20
फागुन है सर पर चढ़ा, तिस पर दूजी भाँग ।
उस पे ढोलक भी बजे, धिक धा धा, धिक ताँग ।।

21
हौले हौले रँग पिया, कोमल कोमल गात ।
काहे की जल्‍दी तुझे, दूर अभी परभात ।।

22
फगुआ की मस्‍ती चढ़ी, मनुआ हुआ मलंग ।
तीन चीज़ हैं सूझतीं, रंग, भंग और चंग ।।

वाह वाह पंकज भाई वाह वाह वाह|
एक नहीं दो नहीं तीन नहीं चार नहीं पूरे के पूरे २२ रंगों में सजे २२ दोहे| वो भी एक से बढ़ कर एक| कविता, आलेख, कहानी वग़ैरह तो पढ़ी थीं आपकी और आज आप के दोहे भी पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ| मैं तो निशब्द हूँ आप की कलम की इस कारीगरी पर| आपकी लेखनी का शत-शत अभिनन्दन| आपने इस मंच से जुड़ कर इस साहित्यिक प्रयास को और भी गति प्रदान कर दी है| आगे भी आप के साहित्यिक सहयोग के मुंतज़िर रहेंगे हम|