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घनाक्षरी छन्द - आयुष चराग़

 


पर्णकुटी में तुम्हें न पाया जिस क्षण सीते!

उस क्षण से तुम्हीं को पाया कण कण में।

शब्दशः मन बसी छवि को उतार दिया

वन वासियों को दिये हुए विवरण में।

विष्णु की विराटता में शारदे कौ वास है - नवीन चतुर्वेदी


अग्नि-वर्ण धातु धार, हृदय प्रसन्न होंय,

स्वर्ण की विविधता में शारदे कौ वास है ।

 

सत्य, शान्ति, शील, धैर्य मातु शारदे की दैन,

प्रति एक शुचिता में शारदे कौ वास है ।

 

पाहन सों चक्र, चक्रवात’न सों विश्व बन्यौ,

नित्य की नवीनता में शारदे कौ वास है ॥

 

कल्पना विहीन विश्व कैसें विसतार पातो,

विष्णु की विराटता में शारदे कौ वास है ।।

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

 

सरस्वती वन्दना, घनाक्षरी छन्द

जोस भरी जनता नें भारत की जेलें भरीं - भगवान दत्त चतुर्वेदी

फोटो में श्री भगवान दत्त जी के साथ लोकर्षि श्री राजेन्द्र रंजन जी [खड़े हुये]
श्री राजेन्द्र रंजन जी का युवावस्था का फोटो है यह

घनाक्षरी छन्द

लाखन की गिनती में जनता नें जेलें भरीं ,
तरस रहे हे कैदी वस्त्र-तसलान कों ।

डेरन में ढेरन कंटीले तार-घेरन में,
भेरन की भांति बंद कियौ इनसान कों।

रूखी दार-रोटिन की बात मत पूंछौ कछू,
तडप रहे हे कहूं कैदी जल-पान कों।

भूख सही प्यास सही गन्दगी की बास सही,
पै न तजी दासता निबारन की बान कों।


“““““““‘


जोस भरी जनता नें भारत की जेलें भरीं,
रेलें भरी बन्दिन के भारी यातायात सों।

होडाहोडी कोडा सहे , छातिन पै घोडा सहे,
रोडा कुटबाये गये छाले भरे हाथ सों।

हथकडी-बेडी सही, आंख-भोंह टेढी सहीं ,
भीत हू भये न रंच बंदी पद-घात सों ।

कष्ट कारागार के कठोर सों कठोर सहे ,
पै न हटे पीछें देशभक्त निज बात सों ।

स्व. श्री भगवानदत्त चतुर्वेदी

सौजन्य : श्री राजेन्द्र रंजन जी