सूर तुलसी की तरह ग़ालिब भी मुझको है अज़ीज़
शेर हों या छन्द, हर इक फ़न से मुझ को प्यार है
जब मैं ग़ज़लें पेश कर रहा होता हूँ तो छन्द प्रेमी सकते में आ जाते हैं और जब छंदों के चरण चाँप रहा होता हूँ तो कुछ और तरह की बातें ही मेरे कानों तक पहुँचने लगती हैं, ये बातें कहने वाले ख़ुद ग़ज़ल या छंद के कितने क़रीब हैं, वो एक अलग मसअला है :)। अपने सनेहियों की ऐसी शंकाओं के समाधान के लिये ही मैंने कभी उक्त शेर कहा था। ख़ैर.......
वो कहते हैं न कि जब-जब जो-जो होना है तब-तब सो-सो होता है। मेरे छन्द सहकर्मियों को याद होगा -