ગઝલ - આખરે એ સત્ય પણ સમજાય છે - વિભા કિકાણી


આખરે એ સત્ય પણ સમજાય છે,

ના પરત આવે જે છોડી જાય છે.

 

પાળ બાંધી તોય ક્યાં બંધાય છે,

રોજ સરવર આંખથી છલકાય છે.

 

મન કરે જાહેર કિલ્લેબંધી પણ,

યાદ ગમતી આવતા રોકાય છે?

 

શબ્દ મારા એમ આવ્યા છે પરત,

જેમ પડઘો ભીંત પર અફળાય છે.

 

કેટલા ટુકડામાં જીવી જિંદગી,

વાત એની ક્યાં કશે મંડાય છે!


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