सन्ततिः भवतु तव सततप्रेमशालिनी ।।01।।
पुण्यनदीषु हि वहतु नेहधारा
सत्यशिवसुन्दराणां घोषशालिनी
भारतजननि ! भव विजयिनी यशस्विनी ।।02।।
सागरतुल्या गहनागभीरा
हिमगिरिसमम्
उच्चादर्शयुक्ता ।
भरतसंस्कृतेश्च धवला पताका
भारतजननि ! भव विजयिनी यशस्विनी ।।03।।
सुवर्णपुष्पा वसुमति धरा च
हरितवर्णतरुभिरलङ्कृता या ।
नानाविधैश्च ओषधिभिः सुदीप्ता
भारतजननि ! भव विजयिनी यशस्विनी ।।04।।
षड्ऋतुसमृद्धा वैभवयुता सा
अनेकैश्च धनधान्यैः श्यामला या ।
विश्वे विराजिता रविभास्वरा सा
भारतजननि ! भव विजयिनी यशस्विनी ।।05।।
नाके वसद्देवैरपि पूजिता या
व्यासगुरुकविवरभूषिता या।
सततवन्दनीया दिव्याधरा मे
भारतजननि ! भव विजयिनी यशस्विनी ।।06।।
यत्रैकता बन्धुता पोषिता च
सद्भावमधुरा समदृष्टिमनोज्ञा ।
सुसंस्कृतिविराजिता रम्यरूपा
भारतजननि ! भव विजयिनी यशस्विनी ।।07।।

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