दोहे - प्रतिभा प्रसाद 'कुमकुम


 गुरू शिष्य व परंपरा , गहन रखें संबंध ।

जंबुद्वीप में आज भी , प्रेम सुधा अनुबंध ।।

 

संस्कृति में संस्कार हो , शिक्षा जग में पूर्ण ।

नई कोंपलें जब खिलें , मधुरसता का चूर्ण ।। 


सत्य सनातन धर्म में , समरसता वसुधैव ।

शिक्षा यही व सत्य भी , ज्ञानी कुटुम्बकैव ।।

 

इच्छा से शिक्षा मिले , सेवा सेवत धर्म ।

गुरू सान्निध्य से मिला , ज्ञान धरा में कर्म ।।

 

सद्गुरु शिक्षा साधना , कर्म सनातन ज्ञान ।

विद्या मिलती तब हमें , करते हैं जब ध्यान  ।।

 

गुरु पद सेवा हम करें, भूल मूल अभिमान ।

बिन माँगे हमको मिले, अक्षर अक्षर ज्ञान ।।

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