चौपाई छंद - श्रद्धा पाठक 'स्वस्ति'

 

कोरे - कोरे क्यों बनवारी ।

ढूँढे आज गोपियाँ सारी।।

कहाँ छुपे हो कान्हा छलिया।

रंग साँवरा ले साँवलिया।।

 

सूनी -सूनी है पिचकारी।

तुम्हें रंगने की अधिकारी।।

राह तके पलपल बेचारी।

आज हुई तुमपर बलिहारी ।।

 

रहना कान्हा थोड़े कोरे।

कर हैं मेरे गोरे-गोरे।।

आज रंगना तुमको चाहे।

लाज करें बड़भाग सराहें।।

 

सारे रंग हुए हैं फीके।

रंग आपके लगते नीके।।

मुझे रंगना ओ सतरंगी।

होना मुझको है अतरंगी।।

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