दोहे - डॉ रानी तँवर


 दधि माखन नित लूटि कै, देवे मटकी फोर।

बाँधै ऊखल सौं कसे, जसुदा माखन चोर।।

 

नरम देह कनु की भई, रसरी गरि कै लाल।

अँखियन तें अँसुवा झरैं, गरम हु’इ गवा भाल।।

 

भरियो घर में दूध दधि, जो माँगे, दूँ हाल।

ग्वालिन सौं फिर लूटि कै, काहे खावै लाल।।

 

मैया मैं घर तें गयौ, माखन मिसरी खाय।

गोपिन ने बरबस दियो, मुख पे दधि लपटाय।।

 

भोली सूरत देखि कै, मैया रीझी जाय।

सखी निगोड़ी रिस करै, झूठो नाम लगाय।।

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