कविता – दोराहा - पूनम सुयाल


मेरे जीवन में भी
एक समय ऐसा आया
जब सब कुछ
चलता हुआ
अचानक ठहर गया।
बाहर की दुनियाजैसी थी वैसी ही बनी रही,
पर भीतर
एक सवाल बार-बार उठने लगा
क्या बस यही पर्याप्त है।
 
उस ठहराव में
मैं खुद को
एक मोड़ पर खड़ा पाती हूँ,
दोराहे पर।
 
वह कोई बड़ा दृश्य नहीं था।
न आँसुओं का सैलाब,
न कोई भारी हादसा।
बस एक थकान थी
जो धीरे-धीरे भीतर उतर गई थी,
खुद को रोज़
समझाते रहने से उपजी।
 
पीछे मुड़कर देखा
तो एक रास्ता
पूरी तरह साफ़ था।
जाना-पहचाना,
संतुलित,
सुरक्षित।
वहाँ वे लोग थे
जो मुझे मेरी पहचान से जानते थे,
वहाँ वे जिम्मेदारियाँ थीं
जिन्हें मैं
सालों से निभाती आ रही थी।
वह रास्ता
कोई ज़ोर नहीं डालता था,
बस इतना कहता था—
यहीं रहो,
सब ठीक तो चल रहा है।
 
आगे की दिशा
धुंध में लिपटी हुई थी।
न कोई पक्का भरोसा,
न कोई तय नक़्शा।
बस मन के भीतर
एक हल्की-सी खींचातानी चल रही थी,
जो आशंका भी जगाती थी
और आगे बढ़ने का
मौन संकेत भी देती थी।
 
दोराहे पर खड़े होकर
मैंने खुद को
काफ़ी देर तक तौला।
क्या मिलेगा,
क्या छूट जाएगा।
जितना सोचती गई,
उतना स्पष्ट होता गया
कि यह उलझन
किसी और की नहीं,
पूरी तरह मेरी है।
 
डर था
गलत मोड़ चुन लेने का,
सब कुछ बिखर जाने का।
डर था
अकेले पड़ जाने का।
और सबसे गहरा डर यह
कि अगर अब भी नहीं चुना,
तो शायद
खुद से नज़र मिलाना
मुश्किल हो जाएगा।
 
अक्सर
दूसरों की राय
आसान लगती है।
वह दिशा भी देती है,
सहारा भी।
पर उस क्षण
मुझे साफ़ समझ आ गया
कि यह निर्णय
किसी और की समझ से
पूरा नहीं हो सकता।
 
दोराहा
मुझसे जल्दबाज़ी नहीं चाहता था।
वह सिर्फ़
मेरी ईमानदारी चाहता था,
मेरे अपने भीतर से।
 
और तब
मैंने कोई बड़ा साहस नहीं दिखाया।
कोई घोषणा नहीं की।
मैंने बस
अपनी अंदर की आवाज़ को
चुप नहीं कराया।
 
मैं यह नहीं कहती
कि चुना हुआ रास्ता
आसान था।
न यह कि वही एकमात्र सही था।
पर वह मेरा था
पूरी तरह मेरा,
किसी से उधार लिया हुआ नहीं।
 
आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो समझ आता है
दोराहा
दो रास्तों का मिलना नहीं था।
वह वह पल था
जब मैंने
अपने जीवन की
जवाबदेही
खुद अपने हाथ में ली।
 
और शायद
यही पल
मेरी कहानी का
सबसे शांत,
सबसे सच्चा
और सबसे अपना
पन्ना बन गया।

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