मेरे जीवन में भी
एक समय ऐसा आया
जब सब कुछ
चलता हुआ
अचानक ठहर गया।
बाहर की दुनियाजैसी थी वैसी ही बनी रही,
एक सवाल बार-बार उठने लगा
क्या बस यही पर्याप्त है।
मैं खुद को
एक मोड़ पर खड़ा पाती हूँ,
न आँसुओं का सैलाब,
बस एक थकान थी
जो धीरे-धीरे भीतर उतर गई थी,
समझाते रहने से उपजी।
तो एक रास्ता
पूरी तरह साफ़ था।
जाना-पहचाना,
वहाँ वे लोग थे
जो मुझे मेरी पहचान से जानते थे,
जिन्हें मैं
सालों से निभाती आ रही थी।
वह रास्ता
कोई ज़ोर नहीं डालता था,
यहीं रहो,
धुंध में लिपटी हुई थी।
न कोई पक्का भरोसा,
बस मन के भीतर
एक हल्की-सी खींचातानी चल रही थी,
और आगे बढ़ने का
मौन संकेत भी देती थी।
मैंने खुद को
काफ़ी देर तक तौला।
क्या मिलेगा,
जितना सोचती गई,
कि यह उलझन
किसी और की नहीं,
गलत मोड़ चुन लेने का,
डर था
अकेले पड़ जाने का।
और सबसे गहरा डर यह
कि अगर अब भी नहीं चुना,
खुद से नज़र मिलाना
मुश्किल हो जाएगा।
दूसरों की राय
आसान लगती है।
वह दिशा भी देती है,
पर उस क्षण
मुझे साफ़ समझ आ गया
कि यह निर्णय
किसी और की समझ से
पूरा नहीं हो सकता।
मुझसे जल्दबाज़ी नहीं चाहता था।
वह सिर्फ़
मेरी ईमानदारी चाहता था,
मैंने कोई बड़ा साहस नहीं दिखाया।
कोई घोषणा नहीं की।
मैंने बस
अपनी अंदर की आवाज़ को
चुप नहीं कराया।
कि चुना हुआ रास्ता
आसान था।
न यह कि वही एकमात्र सही था।
पर वह मेरा था
पूरी तरह मेरा,
दोराहा
दो रास्तों का मिलना नहीं था।
वह वह पल था
जब मैंने
अपने जीवन की
जवाबदेही
खुद अपने हाथ में ली।
यही पल
मेरी कहानी का
सबसे शांत,
और सबसे अपना
पन्ना बन गया।

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