सोरठा छंद - विनीता निर्झर

चादर उतनी तान
, जितनी वह फैले सहज।

जीवन का यह ज्ञान, झोली में भरले अभी।।

 फूलों में है रंग, अलग- अलग आकार हैं।

सच में ही हूँ दंग, ढंग देख संसार के।।


 मीलों उड़ती रेत, पंथ सत्य का है कठिन।

रखना सबसे हेत, यही साथ देगा यहां।।


झीनी जीवन डोर ,कब तक थामोगे इसे।

कोरी रखना कोर, जग काजल की कोठरी।।

श्याम सुनाए राग, वश में सारी गोपियां।
जागे उनके भाग, ब्रज की गलियां धन्य हैं।।

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