छत्तीसगढ़ी गीत – बसन्त - डॉ ममता तिवारी 'मृदुला'


 
पियँर पियँर बगरावत हे,
झुमरत बसंत आवत हे......
 गोंदा ह लहलहावत हे,
सरसो फूल पिवरावत हे,
परसा मन ललियावत हे,
झुमरत बसंत आवत हे.......
 
बोइर ह लदलदावत हे,
पिपर पान इतरावत है,
महुआ ह फुलफुलावत है,
झुमरत बसंत आवत हे.....
 
आमा ह फोंकियावत हे,
महर महर मम्हावत हे,
कोयली मन जुरियावत हे,
झुमरत बसंत आवत हे....
 
डार पान बतियावत हे,
भँवरा मन मनमनावत हे,
तीतली ढनमनावत हे,
झुमरत बसंत आवत हे...
 
जाड़ के समय जावत हे,
गरमी हा खुरियावत हे,
नीक धाम दुरिहावत हे,
झुमरत बसंत आवत हे....
 
खोखमा ह हरियावत हे,
डोंगरी मन सुखावत हे,
कोकडा मन उडावत हे,
झुमरत बसंत आवत हे....
 
मिरगा ह मेछरावत हे,
उचक-उचक लुलुवावत हे,
बादर मन फरियावत हे,
झुमरत बसंत आवत हे.....

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