मैंने रास्तों से ज्यादा
खुद को पढ़ा है इस साल
हर मोड़ पर
कोई मंजिल नहीं,
कभी कोई आदत,
तो कभी कोई डर
छुटता चला गया
मैं गिरी
तो जमीन ने नहीं,
मेरे भीतर के साहस ने
मुझे उठाया
जो पीछे रह गया,
वो हार नहीं थी,
वो सीख थी
जिसे मैं
अब भी
साथ लिए चलती हूँ
यह सफर
मुझे कहीं पहुँचा देगा
या नहीं--
पर इतना तय है
मैं अब
अपने और करीब हूँ

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