कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ - अम्बिका झा

कविता - हिसाब किताब में कच्ची महिलाएँ – अम्बिका झा

 

हिसाब किताब में

बहुत ही कच्ची होती हैं महिलाएँ

तभी तो खर्च कर देती हैं अपने सुकून के पल

खर्च कर देती हैं लड़कियाँ बचपन

ताकि उसे भी वो स्नेह मिल सके

जो भाइयों को मिलता आ रहा है

 महिलाएँ लुटा देती हैं अपनी जवानी

फर्ज समझकर के कहीं माँ बाप की

परवरिश पर उँगली न उठाई जाए

बुढ़ापा लुटा देती हैं

बच्चों के भविष्य की फिक्र में

 

हिसाब मे बहुत ही कमजोर होती हैं महिलाएँ

तभी तो स्त्री धन भी लुटा देती हैं

बात जब घर की इज्जत की आती है

 

नहीं रख पाती हैं हिसाब

सुबह उठने का रात में सोने का

दो रोटी रोज टिफिन में अधिक रख देती हैं

सोचते हुए, आफिस में दोस्तों के साथ

बैठ कर खाते वक्त, रोटी कम न पड़ जाए

जिसके लिए फूहड़पन की उपमाओं से नवाजा जाता

 

हिसाब में इतनी कच्ची होती हैं महिलाएँ

असमय मेहमानों के घर आने पर

अपने हिस्से का निवाला भी

खिला देती हैं बडे़ प्रेम से

 

अपने हिस्से के वक्त को लुटा देतीं

कभी बच्चों पर कभी बुजुर्गों पर

कभी पति पर तो कभी रिश्तेदारों पर

 

नहीं रख पातीं हैं महिलाएँ हिसाब

कितनी रोटियाँ बेलीं कितने कपड़े धोए

कितनी बार तानों को झेला

कितनी बार आंखों में उमड़ा आंसुओ का रेला

 

कितनी ही बार उसके त्याग की अनदेखी हुई

कितनी बार शब्दों से इज्जत को उतारा गया

 

सभी के लिए समय सीमा निर्धारित है

बच्चों का पढ़ने के लिए खेलने के लिए

बुजुर्गों को दवाइयाँ एवं खाने पीने के लिए

कितने बजे आफिस जाना है,

कितने बजे लौटना है पुरूषों के लिए

 

किसी भी समय का हिसाब नहीं रख पातीं महिलाएँ

हिसाब में बहुत ही कच्ची होती हैं महिलाएँ

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