एक दिन एक साल गुजरत बा
का पता बात ई उ समझत बा
छोड़ के चल गइल कहाँ जाने
अब करेजा में टीस टुभकत बा
अब उ कवना गली से निकसत बा
आँख के लोर कोर पर सूखल
चाह के भी ना अब इ टपकत बा
केकरा से कहीं इ सब आफत
अब त गफलत में जान निकलत बा
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विविध भारतीय भाषाओं / बोलियों की विभिन्न विधाओं की सेवा के लिए हो रहे इस उपक्रम में आपका सहयोग वांछित है. सादर.
वाह, बहुत सुन्दर आत्मीय वीणा सिंहा जी । अपनी भाषा और बोली के प्रति आपका प्रेम प्रणम्य है ।
जवाब देंहटाएंBahot hi sundar 👏👏🫡🫡🫶👌👌
जवाब देंहटाएंBahot Sundar gazal hai 👏👏 waah mausi ji ♥️🙏🥰
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