दो नैनों ने मान ली, दो
नैनों की बात
दो जोड़ी नैना जगें, सारी
सारी रात
कच्ची मिट्टी ले रही, अगर
ग़लत आकार
मिट्टी नहीं कुम्हार है, इसका ज़िम्मेदार
पिछली पीढ़ी की गयी, जब
से सर से छाँव
समाचार दिखला रहा, केवल
नफ़रत, द्वेष
बचा नहीं क्या देश में, कुछ
भी अच्छा शेष
मिलकर जुड़कर टूटकर, देखा
कितनी बार
लेकिन तेरे बाद फिर, जमा
नहीं संसार
जिन रिश्तों ने खो दिए, आपस
के संवाद
गर्माहट वो प्यार की, कर
बैठे बरबाद
धन हाथों का मैल है, बस कहने की बात
मैला होने के लिये, दौड़े
जग दिन रात
खुली आँख तक खेल है, दुनिया
दौलत धाक
आँख ज़रा झपकी नहीं, सब मिट्टी सब ख़ाक

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