सेंध लगाकर धँस
रही, हर सू सर्द बयार
मैं कहता हूँ ‘रपट लिख’, काँपे थानेदार
झबरा थर-थर
काँपता, हलकू है मायूस
मौसम की दहलीज पर, खड़ा हुआ है पूस
तेरे सारे ताप की,
खुल
जाएगी पोल
शीतलहर है द्वार पर, दरवाजा मत खोल
सभी निशाने पर
लगे, क्या राजा क्या रंक
कुहरा बनकर माफिया, फैलाए आतंक
स्वेटर,
मफलर,
टोपियाँ,
इनर
हो रहे फेल
बड़े प्राणलेवा हुए, शीतलहर के खेल
काँपें घर-दालान
सब, जब सुविधाएँ साथ
करते होंगे क्या भला, चौराहे-फुटपाथ?
वर्तमान से काँप
कर, बन जाएँ ये पास्ट?
बूढ़ी काकी का
कहीं, जाड़ा ना हो लास्ट
बूढ़ी दादी देर से,
तरस
रहीं असहाय
मिल जाती इस शीत में, अदरक वाली चाय
काका ठिठुरें शीत
से, कैसे करें बचाव
आमंत्रण देता रहा, सारी रात अलाव
होरी थर-थर
काँपता, हलकू है मायूस
मौसम की दहलीज़ पर, खड़ा हुआ है पूस
ठिठक गई हर
ज़िन्दगी, थमे सभी के पाँव
कुहरे की चादर पहन, कहाँ छिप गया गाँव
कुहरे के गुर्गे
करें, सूरज का किडनैप
कहाँ गया किस ओर को, ‘अंजुम’ ढूँढो मैप
पखवाड़े से था
जहाँ, शीतलहर का राज
बूँदाबाँदी आज की, हुई कोढ़ में खाज
काँपें घर-दालान
सब, जब सुविधाएँ साथ
करते होंगे क्या भला, चैराहे-फुटपाथ?
दुष्चरित्र मौसम
हुआ, पल- पल बदले रूप
कोहासे की उम्र में, चटक रही है धूप
तन-मन भीगे
रात-दिन, कुहरा गाये गीत
लगीं थिरकने पसलियाँ, रास रचाए शीत
आँगन में लेटे
ससुर, करें धूप का पान
कमरे में ठिठुरे बहू, सिकुड़ी जाए जान
बढ़ते-बढ़ते यों
बढ़ा, उफ्! सर्दी का कोप
जैसे कफ़्र्यू लग गया, भीड़ हो गई लोप
सर्दी ने ऐसे रखे,
गली-गली
में पाँव
सब घर में दुबके पड़े, लगा ठिठुरने गाँव
शीत-लहर का छा
गया, जन-जन पर आतंक
घर से निकलें पाँव तो, हवा मारती डंक
काका थर-थर
काँपते, जाड़े का उत्पात
इक चादर कैसे कटे, सर्दी की ये रात
पलक झपकते हो रहा,
दिन
सारा काफू़र
और रात लम्बी हुईं, भोर बड़ी है दूर
झबरा भट्ठी में
छुपा, हलकू खोजे आग
लगे पूस की रात ये-हो ज़हरीला नाग
मैं कहता हूँ ‘रपट लिख’, काँपे थानेदार
मौसम की दहलीज पर, खड़ा हुआ है पूस
शीतलहर है द्वार पर, दरवाजा मत खोल
कुहरा बनकर माफिया, फैलाए आतंक
बड़े प्राणलेवा हुए, शीतलहर के खेल
करते होंगे क्या भला, चौराहे-फुटपाथ?
मिल जाती इस शीत में, अदरक वाली चाय
आमंत्रण देता रहा, सारी रात अलाव
मौसम की दहलीज़ पर, खड़ा हुआ है पूस
कुहरे की चादर पहन, कहाँ छिप गया गाँव
कहाँ गया किस ओर को, ‘अंजुम’ ढूँढो मैप
बूँदाबाँदी आज की, हुई कोढ़ में खाज
करते होंगे क्या भला, चैराहे-फुटपाथ?
कोहासे की उम्र में, चटक रही है धूप
लगीं थिरकने पसलियाँ, रास रचाए शीत
कमरे में ठिठुरे बहू, सिकुड़ी जाए जान
जैसे कफ़्र्यू लग गया, भीड़ हो गई लोप
सब घर में दुबके पड़े, लगा ठिठुरने गाँव
घर से निकलें पाँव तो, हवा मारती डंक
इक चादर कैसे कटे, सर्दी की ये रात
और रात लम्बी हुईं, भोर बड़ी है दूर
लगे पूस की रात ये-हो ज़हरीला नाग

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी करने के लिए 3 विकल्प हैं.
1. गूगल खाते के साथ - इसके लिए आप को इस विकल्प को चुनने के बाद अपने लॉग इन आय डी पास वर्ड के साथ लॉग इन कर के टिप्पणी करने पर टिप्पणी के साथ आप का नाम और फोटो भी दिखाई पड़ेगा.
2. अनाम (एनोनिमस) - इस विकल्प का चयन करने पर आप की टिप्पणी बिना नाम और फोटो के साथ प्रकाशित हो जायेगी. आप चाहें तो टिप्पणी के अन्त में अपना नाम लिख सकते हैं.
3. नाम / URL - इस विकल्प के चयन करने पर आप से आप का नाम पूछा जायेगा. आप अपना नाम लिख दें (URL अनिवार्य नहीं है) उस के बाद टिप्पणी लिख कर पोस्ट (प्रकाशित) कर दें. आपका लिखा हुआ आपके नाम के साथ दिखाई पड़ेगा.
विविध भारतीय भाषाओं / बोलियों की विभिन्न विधाओं की सेवा के लिए हो रहे इस उपक्रम में आपका सहयोग वांछित है. सादर.