दोहे - विजेन्द्र शर्मा

 

इक रिश्ता बेनाम सा , चला थाम के हाथ !
इक रिश्ता घुटता रहा , लेकर फेरे साथ !!
 
 
भारी पत्थर इश्क़ है , कहते थे ये "मीर" !
चलो उठा के देख लें , आगे जो तक़दीर !!
 
दुनिया है रफ़्तार की , खरगोशों का दौर !
किस्सों तक ही ठीक है , कछुए वाले तौर !!
 
कभी ठहरते ही नहीं ,जीवन के दिन -रात !
पर ठहरा वो एक पल , जिसमे तुम थे साथ !!
 
 
जलते रहे चराग़ सेमहफ़िल में हम रात !
चाँद सितारों की छपी , अख़बारों में बात !!
 
देना  है तो दे ख़ुदा , ऐसा हमे मिज़ाज !
खुद्दारी सर पर रहे , ठोकर में हो ताज !!
  
  
भले  क़लम दे हाथ में , या दे दे तलवार !
मौला इनकी तू मगर , पैनी रखियो धार !!
 
तब तो  हमको सौंप दी , जब था तेज़ बहाव !
पहुँच किनारे हो गयी , किसी और की नाव !!

 ग़मआँसूतनहाइयाँचारों तरफ अज़ाब !
इन कांटो के बीच भी , तेरी याद गुलाब !!
 
फिसल  जाऊं फिर कहींरहूं हुस्न से दूर
मगर आपकी डीपियां , करती हैं मजबूर
 
दरिया तेरा दायरा , बढ़ तो गया ज़रूर !
मगर किनारे हो गए , पहले से भी दूर !!
 
 
इस्टेशन पर रह गए , हम लहराते हाथ !
कोई ख़ुद को छोड़कर , हमे ले गया साथ !!


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