ગઝલ - જેટલા હપ્તા ભરેલા લોહીથી શણગારના – દીપક પેશવાણી

 


જેટલા હપ્તા ભરેલા લોહીથી શણગારના,

એટલા સુખ ક્યાં હું પામ્યો "આપણા" ઘરબારના?

 

તારા ફળિયા પર મને શંકા રહે છે કેમ કે,

ચોતરફ રસ્તા મળે ત્યાં બહુ બધા વિસ્તારનાં. 

 

બોલહું આવું ઉપર કે તું નીચે આવીશ પ્રભુ!

કાનને ખૂંચે છે પ્રશ્નો શ્વાસના-ધબકારના.

 

ખોટાં મોટા કામ થાતાં હોય છે એના થકી,

એટલે આંસુ ગયા એળે ખરું રડનારના.

 

ભાંગી-તોડી-ભુક્કો કરશો તોય ડેલો નહિ મૂકું,

માટીને  હોતાં  નથી  પ્રશ્નો  કદી  આકારનાં.

 

હું "દીપક"  ઓરડો અજવાળવા મથતો રહ્યો,

જેના છત 'ને બારણાં પૂજક હતા અંધારના.

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