कुण्डलिया छन्द - गाफिल स्वामी

 

 

चाहे  संत   सुजान  या, सूर, शेठ, शैतान ।

निज कर्मों का भोगते, भोग  सभी इंसान ।।

भोग  सभी  इंसान, भोगकर जग से जाते ।

मद माया में लिप्त, लोग ये  समझ न पाते ।।

स्वामी  गाफिलदास, बुरा  करता  है  काहे ।

माफ    होते पाप दान कर या तप चाहे ।।

 

फूलों के जैसा महक, और लुटा नित गंध ।

यही प्रीति की रीति है, कर इससे अनुबंध ।।

कर इससे अनुबंध, प्रेम में जगत  समाया ।

धन्य वही इंसान , प्रेम धन  जिसने  पाया ।।

स्वामी सोच विचार, करे  मत  ऐसा  वैसा ।

लुटा प्रेम की गंध, महक  फूलों  के  जैसा ।।

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