चाहे
संत सुजान या, सूर, शेठ, शैतान ।
निज कर्मों का भोगते, भोग सभी इंसान ।।
भोग
सभी इंसान, भोगकर
जग से जाते ।
मद माया में लिप्त, लोग ये समझ न पाते ।।
स्वामी
गाफिलदास, बुरा करता
है काहे ।
माफ
न होते पाप , दान कर या तप चाहे ।।
फूलों के जैसा महक, और लुटा नित गंध ।
यही प्रीति की रीति है, कर इससे अनुबंध ।।
कर इससे अनुबंध, प्रेम में जगत समाया ।
धन्य वही इंसान , प्रेम धन जिसने पाया
।।
स्वामी सोच विचार, करे मत ऐसा
वैसा ।
लुटा प्रेम की गंध, महक फूलों के जैसा ।।

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