लिखने बैठा समझ न आया
मैं क्या आज लिखूँ
पाँवों के मैं घाव लिखूँ ?
आँखों के ख़्वाब लिखूँ ?
किसके शब्दों ने है किसके
दुख को सहलाया
सुख के ऊपर हर पल देखा
दुख का ही साया
सोचा उसके दुख-दर्दों पे
झंडू बाम लिखूँ
छीना हमने ठौर ठिकाना,
बरगद- पीपल से
काट दिया पंखों को हमने
उड़ने से
पहले
पंछी का कैसे कर यारो,
मैं संताप
लिखूँ
हर औहदे पर जालिम बैठा
मंसूबे लेकर
बनता नहीं काम कोई भी
अब लेकर देकर
आखिर बोलो किसको मैं
अपनी फरियाद लिखूँ
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