क़दों को नापने
बौने खड़े हैं
सभी की गर्दनें
कस कर तनी हैं
सभी सर को उठाए
हैं खड़े
सभी को है
ग़लतफ़हमी यही बस
सभी में हैं
वही सबसे बड़े
यहाँ कोई किसे
समझा सकेगा?
सभी हैं शून्य
सब ही सैकड़े हैं।
उचकते दिख रहे
पंजे कहीं पर
कहीं कंधे चढ़े
बैठे हुए
कहीं आवाज़ की
सीढ़ी बना कर
उसी पर बैठ कुछ
ऐंठे हुए
अजब ज़िद है
ग़ज़ब की कोशिशें भी
मगर वो हैं,
अड़े हैं तो अड़े हैं
झुकें या फिर
गिरें इनके क़दों तक
कि चढ़ने दें सरों पर,
क्या करें ?
मुसीबत है यही
क़द्दावरों की
तने इन पर कि
इनसे ही डरें
विकल्पों में यही बस
श्रेष्ठतम है
कि कह दें
‘आप ही सबसे बड़े हैं ‘

बहुत सुन्दर विचारपरक नवगीत । सीमा जी को बहुत बधाई !
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