और भी शानदार रही नस्ल-ऐ-नौ भारत मुशायरे की तीसरी कड़ी – उमेश कुमार शर्मा

किस किस को मैं बयान करूं और किसको छोड दूं ,
उस महफिल में हर एक शायर था कोहिनूर की मानिंद।
 
जी हां दोस्तों मेरा यह शेर उन सभी 12 कोहिनूर शायरों पर खरा उतरता है जिनसे भाई नवीन जोशी जी ने नस्ल-ऐ-नौ भारत की तीसरी महफिल रोशन की थी।
 
इंशाद फाऊंडेशन के रूहेरंवा भाई नवीन जोशी ‘नवाजी के स्नेहिल निमंत्रण पर 29 नवंबर की शाम रंगशारदा बांद्रा मुंबई के उसी शानदार हाल और स्टैज जिसपर इंशाद द्वारा नस्ल-ए-नौ भारत के पिछले दो संस्करणों का सफल आयोजन किया गया था, वहीं पर एक बार फिर से नस्ल-ए-नौ भारत की तीसरी महफिल के इन 12 कोहिनूरों से रूबरू होने और राब्ता फाऊंडेशन के संस्थापक भाई शिवम् झा का स्वागत करने का मौका मिला।
 
मुंबई के बांद्रा क्षेत्र में स्थित रंगशारदा नाट्यमंदिर शहर की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है, इसी मंच पर नस्ल-ए-नौ भारत जैसे कार्यक्रमों ने उर्दू शायरी की नई पीढ़ी को अपनी आवाज़ दुनिया के सामने रखने का अवसर दिया। 'नस्ल-ए-नौ भारत’ नाम ही यह इशारा करता है कि यह मंच भारत की नई पीढ़ी के शायरों और शायरी के लिए समर्पित है। इस मुशायरे का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि देशभर के युवा रचनाकारों को एक पेशेवर, अनुशासित और गरिमामय मंच देना है, जहां वे अनुभवी उस्तादों के साथ बैठकर अपने कलाम को परख सकें।
 


मुंबई के इस मुशायरे के आयोजन में भाई नवीन जोशी जी की सरपरस्ती में इंशाद फाउंडेशन साहित्यिक संस्था की सक्रिय भूमिका रही, जो देशभर में गुणवत्तापूर्ण मुशायरों और युवा प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए पहचानी जाती हैं।मंच-सज्जा, रोशनी, ध्वनि व्यवस्था और दर्शकों की बैठने की आरामदेह व्यवस्था ने रंगशारदा की उस शाम को एक मुकम्मल सांस्कृतिक उत्सव का रूप दे दिया।
 


मुशायरे में देश के विभिन्न हिस्सों से आए शायरों ने ग़ज़ल, नज़्म, तरही और मुक्त हल्के-फुल्के शेरों के माध्यम से प्रेम, समाज, राजनीति और इंसानी जज़्बात पर अपनी बात रखी। कई युवा शायरों के लिए यह उनका पहला बड़ा मुशायरा था, इसलिए उनके लिए यह अनुभव यादगार, प्रेरणादायक और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला साबित हुआ।
 
नस्ल-ए-नौ भारत 3 की इस महफिल का आरंभ दीप प्रज्वलन एवं राष्ट्र गान के साथ हुआ। मुशायरे की शुरूआत आयुष कश्यप के साथ हुई। और क्या ही शानदार शुरूआत थी। मुशायरे की शुरूआत से ही मुशायरे का मेयार समझ आ गया था। आयुष ने उर्दू शायरी के बाद एक हिंदी गीत भी सुनाया जो सभी के दिलो दिमाग पर छा गया।
 
1.
कोशिशें तो बहुत हमने की थीं मगर
तुमको पाने की संभावना व्यर्थ थी
हमने सोचा था तुमको सुनाएंगे पर
प्रेम के गीत पृष्ठों में ही रह गये
नींद की नींव पर जो बनाये महल
एक दिन वो विरह धार में बह गये
फिर कभी गीत कोई रचा ही नहीं
फिर किसी से कोई भावना व्यर्थ थी
कोशिशें तो बहुत...
 
पांव से जैसे कांटा निकाले कोई
इस तरह उस हृदय से निकाले गए
फिर निरंतर तमस उर में भरता रहा
मेरे जीवन से सारे उजाले गए
दीप उर में जलाए रखा था मगर
रोशनी की कोई कल्पना व्यर्थ थी
कोशिशें तो बहुत...
 
एक ये दुख कि तुम लौट आए नहीं
एक ये दुख कि हमने पुकारा नहीं
ये हृदय कह रहा था चलो उस तरफ
और मन कह रहा था दुबारा नहीं
यह समझने में हमको लगे दो बरस
एक निर्जीव से प्रार्थना व्यर्थ थी
कोशिशें तो बहुत...
 
आयुष कश्यप
 
फिर बारी आयी मुंबई के उपनगर कल्याण में पले बढेअमन मिश्रा ‘अनन्तकी जिसको मैने अपनी आंखों के सामने कल्याण और उसके आसपास के इलाकों के कवि सम्मेलन और मुशायरों के अल्हड शायर से लेकर ईंशाद के मंच पर एक परिपक्व शायर तक का सफर करते देखा है। और यह देखकर बहुत ही खुशी हुई कि अमन ने अपनी मेहनत और लगन से आज यह मुकाम हासिल किया है।
 
2.
मर्द हो तो शान से मर्दानगी का मान रखना
औरतों के उन दिनों में औरतों का ध्यान रखना
मुझको ग़ालिब मीर तो समझे नहीं उसने कहा था
तुम अगर शायर बनो तो शे'र को आसान रखना
 
कंकर कंकर धाम मिलेगा
ढूँढोगे तो राम मिलेगा
गुड़िया की शादी कर देंगे
जब फ़सलों का दाम मिलेगा
जन्नत मिल जाएगी लेकिन
बंदों को आराम मिलेगा
सारे काबिल हो जाएँगे
दीवाना नाकाम मिलेगा
सारे पापी पछताएँगे
हर रावण को राम मिलेगा
 
अमन मिश्रा 'अनंत '
 
तीसरे शायर थे नर्मदा पुरम से राज सोलंकी 'सफर ' जिन्होंने अपने लहजे में ये शेर कहे।
 
3.
मैने ये कब कहा है कि तू मेरे साथ काट
तेरी है, जिसके साथ भी अपनी हयात काट
मैने कहा भी था कि मेरा हाथ मत पकड
अब अपना हाथ काट या फिर मेरा हाथ काट
 
सांस लेना मुहाल हो जाए
ऐसी नजदीकियों से डरता हूँ
जंग से मुझको डर नहीं लगता
मैं तो कुर्बानियों से डरता हूँ
 
तैरना मुझको समंदर में सिखाने वाले
शुक्रिया नाव में सूराख बनाने वाले
वो कहानी लिखो लिखनी है तो लिखने वालों
के मिटाते हुए, मिट जाएं, मिटाने वाले
 
राज सौलंकी
 
चौथे शायर ध्रुव केलिया (जूनागढ़) ने अपने गुजराती लहजे में कुछ बहुत ही अच्छे शेर सुनाए
 
4.
 
कोई रिश्ता नहीं निभाने को;
कुछ बचा ही नहीं बचाने को!
अब रगें काटने से क्या होगा;
खून है ही नहीं बहाने को!
खामखां आप झुक गए साहिब;
कुछ गिरा ही नहीं उठाने को!
हमने आँखों में क़ैद रक्खा है;
एक मंज़र कहींँ दिखाने को!
 
अपनी तासीर से निकल आया
मैं तकी मीर से निकल आया
मेरी आँखों में देखकर आँसू
हाथ तस्वीर से निकल आया
ये अलग बात कटगया लेकिन
पांव जंजीर से निकल आया
जंग के आखिरी पडाव पर
खून शमशीर से निकल आया
 
ध्रुव केलिया
 
और इस महफिल के पांचवें शायर थे महाराष्ट्र के अकोला से आए हुए जनाब ऐजाज़ बिस्मिल साहब जिन्होंने अपनी बाकमाल शायरी और अपने पुर असर लहजे से सबको अपना मुरीद बनाकर यह महफिल लूट ली।
 
5.
उसने हमें पुकार के क्या कुछ नहीं कहा
पूछा जो क्या कहा तो कहा कुछ नहीं कहा
खुश हो रहा हूँ कितना मैं इकरारे ईश्क पर
हांलाकि उसने हूं के सिवा कुछ नहीं कहा।
 
दिल सुलगती हुई खाहिश में धुंआ होता क्या
मैं अगर ईश्क ना करता तो यहाँ होता क्या
वो जगह दिल में तेरी याद जहाँ रखी है ,
गर तेरी याद ना होती तो वहाँ होता क्या
 
जबसे मैं अपने शहर की पहचान हो गया
तबसे अमीर ए शहर परेशान हो गया
उसकी भी शादी हो गई मेरी भी हो गई
इक फैसले से चार का नुकसान हो गया
 
मैने बस इतना कहा ईश्क की तस्वीर बना
फिर मेरे जख्म बने और तेरा तीर बना
अब ये हालत है कि है ईश्क का साया मुझपर
इक जमाने में बडा फिरता था मैं पीर बना
उसकी ख्वाहिश है मेरे दिल पे बनाये वो दिल
उससे कहना, ये रहा सीना मेरा, चीर बना
 
एजाज बिस्मिल
 
जनाब एजाज बिस्मिल की शानदार शायरी ने मुशायरे को उस बुलंदी पर पहुंचा दिया था कि अब लगने लगा था कि आने वाले शायर के लिए मुशायरे का यही मेयार बरकरार रखना मुश्किल होगा। पर इस मुश्किल काम को अपनी खूबसूरत शायरी से बखूबी अंजाम दिया बरेली के युवा शायर कुमार कौशल ने।
 
6.
दिक्कत में मुसीबत में मेरे शेर पढेगा
संसार ईबादत में मेरे शेर पढेगा
तूने मुझे ठुकरा दिया लेकिन तेरा महबूब
इजहारे मुहब्बत में मेरे शेर पढेगा
 
खर्च सांसो को कर रहा हूँ मैं
खर्च होने से डर रहा हूँ मैं
उम्र की सीढियों को चढते हुए
जिंदगी से उतर रहा हूँ मैं
 
कोशिश तो कर रहा हूँ मगर हो नहीं रहा
मुझसे ये जिंदगी का सफर हो नहीं रहा
टकराके सिर्फ सर ही हुआ है लहू लुहान
दीवार गिर नहीं रही दर हो नहीं रहा
 
दिल है तुम्हारे साथ तो हम दिल के साथ हैं
जो दिल के साथ हैं वही मंजिल के साथ हैं
इक लाश बोलती है जमीं पर पडे पडे
खामोश जो खडे हैं वो कातिल के साथ हैं
 
सिर्फ पैसे ला रही है नौकरी
ख्वाब सारे खा रही है नौकरी
जो किसी की भी नहीं सुनता उसे
बॉस की सुनवा रही है नौकरी
 
खुशी ने मुझको दिया ही क्या है
खुशी ठिकाने लगा रहा हूँ
उसे पता है कि बेचकर गम
मैं अपनी रोटी कमा रहा हूँ
 
है कर्म वो ही, वही है कारक
वही है कर्ता मैं जानता हूँ
उसी ने हांडी चढा रखी है
मैं तो सिर्फ कडछी घुमा रहा हूँ
 
कुमार कौशल
 
इसके बाद ग्रेटर नौएडा से आयी हुई इस मुशायरे की अकेली शायरा कीर्ति ने अपनी गजल से सबको भावविह्वल कर गहरे जज्बातों में डुबो दिया।
 
7.
अगर दुल्हन बनाने पूर्व सक्षम भी बनाते तो
मुझे जलना नहीं पड़ता किताबें ना जलाते तो
कलेक्टर जो ख़रीदा आपने अब क़र्ज़ लेकर के
वो बन तो मैं भी सकती थी मुझे आगे पढ़ाते तो
मैं अपनी झोपड़ी की ही सही पर मालकिन होती
किसी कोठी के आँगन में नहीं दफ़ना के आते तो
मुझे परहेज़ थोड़ी है रसोई की थकावट से
ज़रा सा ज़र्फ़ अपने लाडलों को भी सिखाते तो
ज़माने से हैं हारे आप और मैं आपसे हारी
मज़ा तो तब था हम मिलकर ज़माने को हराते तो
सुना है बेटियाँ आँगन की चिड़ियाँ होती हैं बाबा
मुझे खूँटे से क्यूँ बाँधा मुझे उड़ना सिखाते तो
 
कीर्ति शायरा
 
कीर्ति की जज्बाती गजल के बाद मुंबई के शायर भाई इरफ़ान तारिक़ खान ने अपनी शायरी से माहौल को खुशनुमा बनाया।
 
8.
खुदा तेरी कुछ ऐसे बंदगी की
बुराई छोडकर बस शायरी की
अंधेरों पर भरोसा हो रहा है
कहानी पढ रहा हूँ रोशनी की
मुसीबत क्यों मुझे उकसा रही हो
मेरी आदत नहीं है खुदकुशी की
समझ में आ रही है धीरे धीरे
बडी तीखी जबां है जिंदगी की
 
सब कहते हैं पत्थर दिल है
उस पत्थर के अंदर दिल है
अपनी मर्जी से जीता है
मजहब से भी कट्टर दिल है
गर दुनिया है विष का प्याला
तो मेरा भी शंकर दिल है
चेहरे को क्या देख रहे हो
चेहरे से भी सुंदर दिल है
 
इरफान तारिक खान
 
इसके बाद मुशायरे के नाजिम कोटा के तनोज दाधीच को उनके कलाम के लिए आवाज दी गई और तनोज भाई ने हमेशा की तरह अपनी पेशकश से वाह वाही लूटी।
 
9.
वो दूर मुझसे जब हुआ रोकर नहीं हुआ
तो मैं भी इंतजार में पत्थर नहीं हुआ
दुनिया को जहर पीके बचाओ तो बात है
बस भांग पी के कोई भी शंकर नहीं हुआ
 
तनोज दाधिच
 
इसके बाद मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार से सम्मानित शिवपुरी मध्य प्रदेश से पधारे शायर सुभाष पाठक ‘ज़िया ने अपनी खूबसूरत शायरी से सबको मुतासिर किया।
 
10.
लुत्फ सारा मुहब्बत का जाता रहा
मैं उसे वो मुझे आजमाता रहा
जीत में भी मजा जीत का था कहाँ
हारने वाला जब मुस्कुराता रहा
 
राब्ता इक हसीन टूटा है
फूल ताजा तरीन टूटा है
अब के तो अश्क भी नहीं आए
अब के दिल बेहतरीन टूटा है
 
सुभाष पाठक जिया
 
और इसके बाद बारी थी उर्दू शायरी और शुद्ध हिंदी कविता दोनों पर समान अधिकार रखने वाले सौम्य व्यक्तित्व के मालिक जबलपुर के आयुष चराग़ की। जिन्होंने शुरूआत तो गजल से की थी पर अंत में अपने हिंदी गीतों की रसधारा से हर एक श्रोता को मंत्रमुग्ध कर दिया।
 
11.
खिलेंगे फूल भी मिट्टी सा रखरखाव तो दे
तू मुझ दरख्त को पानी ना दे लगाव तो दे
मुझे पता है शरारे कहाँ तक आते हैं
मैं अपनी हद में रहूंगा मुझे अलाव तो दे
करेगा कौन यंकी रौशनी को चूमा है
मेरे बदन में कहीं पर जले का घाव तो दे
नजर में आ कि मेरे आसुओं में हलचल हो
नदी बनायी है तूने इसे बहाव तो दे
 
नयन तुम्हारे के अपार क्षीर सिंधु जैसे
इनमें उतरते जो प्राण त्याग देते हैं
काले मतवाले केश के विशेष सर्प सदा
विष नहीं चंदनी सुंगध के चहेते हैं
 
पांव जल में डाल तुम क्या बेठली कुछ पल
लोग तट पर अर्चना करने लगे हैं
नभ अरूण के ताप से पिघला नहीं है
दिन अभी तक ठीक से निकला नहीं है
किंतु लहराये तुम्हारे केश कुछ ऐसे
लोग संध्या वंदना करने लगे हैं
कह रहे हैं रूप का अवतार तुमको
प्रेम पर होता हुआ उपकार तुमको
तुम भले ही वर ना दे पाओ इन्हें लेकिन
लोग तो आराधना करने लगे हैं
याद करती हो किसी बिछडे हुए को
डूब कर इतना किसी डूबे हुए को
देखती हो ध्यान से जलधार तुम जैसे
लोग क्या क्या कल्पना करने लगे हैं
 
आयुष चराग
 
इस समय लग रहा था कि मुशायरा अपने पूरे शबाब पर पहुंच चुका है पर अभी तो फरीदाबाद से आये आखिरी शायर बालमोहन पांडे का जलवा देखना बाकी था। जिन्होंने अपनी बाकमाल शायरी और अपने अंदाजे बयां से महफिल में वो समां बांधा कि जो सुनने वालों के जहन में बरसों बरस तक ताजा रहेगा।
 
12.
बेसहारा ना हो गया हो कहीं
दिल तुम्हारा ना हो गया हो कहीं
मुझको डर है बिछडके वो मुझसे
और प्यारा ना हो गया हो कहीं
 
दो दिमागों का है समझाया हुआ
दिल मगर मासूम घबराया हुआ
मुफलिसों को सिर्फ इतनी छूट है
देख सकते हैं पसंद आया हुआ
 
हो चुकी शब तमाम उसके लिए
मुखतलिफ है निजाम उसके लिए
वो अगर खामोशी समझती है
तो ये सारा कलाम उसके लिए
उससे कहना के मैने कुछ ना कहा
खामोशी है पयाम उसके लिए
 
बालमोहन पांडे
 
और कार्यक्रम के अंत में स्वर्गीय शायर रजत गुप्ता 'अहद' की एक एक ग़ज़ल नवीन जोशी 'नवा', आशुतोष मिश्रा ‘अज़ल और हर्षिल गाफ़िल ने पेश की जिसको सुनकर सभी श्रोता भावुक हो गये।
 
कहा ख्वाब ने मैं अधूरा रहूंगा
सहर तक मगर बस मैं तेरा रहूंगा
के जब तक रहेगी यूं कच्ची ये मिट्टी
मैं हर रोज पैकर बदलता रहूंगा
मुझे उम्र ने है ठगा किस तरह से
मुझे तो लगा था कि मैं बच्चा रहूंगा
मुहब्बत का सौदा है घाटे का सौदा
मेरी हो ना हो तू मैं तेरा रहूंगा
 
रजत गुप्ता 'अहद '
 
व्यक्तिगत व्यस्तताओं के कारण पोस्ट देर से लिख पा रहा हूँ इसके लिए माफी चाहता हूँ। पोस्ट बहुत लंबी हो गई है पर इतने सारे कोहिनूरों के बारे में कम शब्दों में लिख पाना संभव भी तो नहीं था। मेरा यह लेख मुंबई के मशहूर रंगशारदा नाट्यमंदिर में आयोजित नस्ल-ए-नौ भारत के मुशायरे की झलक और उसकी रूह को सामने रखने की कोशिश है। इसमें सिर्फ तथ्य नहीं, उस शाम की महक, आवाज़ें और एहसास भी दर्ज हैं।
 


मुंबई से बाहर स्थानांतरण होने के कारण बहुत समय बाद किसी अच्छे मुशायरे में जाने और भाई देवमणि पाण्डेय जी, नवीन सी चतुर्वेदी जी और हुमायूँ कबीर जी से सुखद भेंट का मौका मिला। इस शानदार शाम को सजाने और मुझे इसका हिस्सा बनाने के लिए भाई नवीन जोशी जी का बहुत बहुत धन्यवाद और ईंशाद फाऊंडेशन की पूरी टीम को बहुत ही शानदार मुशायरे के सफल आयोजन पर बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ।
 
मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में ऐसी शामें और भी सजती रहेंगी।
 


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