ग़ज़ल – हाल अपना बता नहीं सकते – अफ़सर दकनी

 


हाल अपना बता नहीं सकते

दिल का दुखड़ा सुना नहीं सकते

 

बातों-बातों में रूठ जाते हो

अब के तुमको मना नहीं सकते

 क्या ज़रूरत है ऐसे रिश्ते की

एक दिन भी निभा नहीं सकते

 

फ़ैसला दिल ने कर लिया आख़िर

क्या हुआ हम बता नहीं सकते

 

कैसी उलझन में फँस गए आख़िर

जो हुआ वह भुला नहीं सकते

 

सिलसिला दूर तक पहाड़ों का

जाना चाहें भी जा नहीं सकते

 

ग़म के दरिया को पार करना है

टूटी कश्ती में जा नहीं सकते

 

आसमाँ तक उड़ान भरनी है

काग़ज़ी पर लगा नहीं सकते

 

चाँद बादल में छुप गया अफ़सर

रुख़ से पर्दा हटा नहीं सकते

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