ગુજરાતી ગઝલ - શેનું છાંટીને નીકળે છે અત્તર જેવું – દિલીપ રાવલ

 


શેનું છાંટીને નીકળે છે અત્તર જેવું

આઈ થિન્ક એને બેઠું છે સત્તર જેવું

 

કેમ કરીને વાત અમારી ત્યાં લગ પહોંચે ,

એણે પહેરી લીધું છે કંઇ બખ્તર જેવું

 

મેળ થશે શું ? મિજાજ તારો લંડન જેવો

અહીં અમારે કાયમનું છે લખતર જેવું

 

મૌન તમારું મુંજારાની મોસમ જાણે

ને બોલો તો લાગે બેગમ અખ્તર જેવું

 

અમને એમ કે બધું ભૂલીને નિરાંત થઇ ગઈ

હજુ બચ્યું છે અંદર થોડું કળતર જેવું

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