यही है मसलहत वरना ये बूढ़ा बोल सकता है
न मैना बोल सकती है, न तोता बोल सकता है
किसी मासूम हसरत का
जनाज़ा दफ़्न है इसमें
कोई पूछे तो मिट्टी का घरौंदा बोल सकता है
हसद की आग में दिन-रात
जो जलता है ए ‘असलम’
वो अच्छा सोच सकता है, न अच्छा बोल सकता है
कोई पूछे तो मिट्टी का घरौंदा बोल सकता है
वो अच्छा सोच सकता है, न अच्छा बोल सकता है

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