12 August 2016

ब्रज गजल - नवीन

फोकट में भन्नाय रए हौ - हत का ऐ। 
खुद्द'इ गाल बजाय रए हौ - हत का ऐ॥
ज्ञानि'न कों भरमाय रए हौ - हत का ऐ। 
घी कों तेल बताय रए हौ - हत का ऐ॥
किसमत सों हीरा पायौ सो फेंक दियौ। 
मोति'न पै मगराय रए हौ - हत का ऐ॥
सैमइ कों तौ देखत ही म्हों फेरत हौ। 
चख-चख मैगी खाय रए हौ - हत का ऐ॥
बाहर बोलत हौ रोटि'न के लाले हैं। 
भीतर पाग पगाय रए हौ - हत का ऐ॥
जा कों देखत उलटी आवत हैं, ता कों। 
जमना में पधराय रए हौ - हत का ऐ॥
गोवरधन की महिमा हू बिसराय दई। 
सपरेटा चढवाय रए हौ - हत का ऐ॥
जहँ तुलसी कौ राज रह्यौ उन कुंज'न में। 
कंकरीट बिछवाय रए हौ - हत का ऐ॥
लक्ष्मी, काली, दुर्गा मैया के भगतौ।
बेटि'न कों बिदराय रए हौ - हत का ऐ॥
गैया कों मैया मानौ हौ तौ फिर चों। 
कट्टीघर खुलवाय रए हौ - हत का ऐ॥
'नवीन' जी हम कों तौ बस यै बतलाउ। 
विजया कब छनवाय रए हौ - हत का ऐ॥

नवीन सी. चतुर्वेदी


ब्रज गजल

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