10 November 2013

किसी और में वो लचक न थी किसी और में वो झमक न थी - नवीन

किसी और में वो लचक न थी किसी और में वो झमक न थी।
जो ठसक थी उस की अदाओं में किसी और में वो ठसक न थी॥

न तो कम पड़ा था मेरा हुनर न तेरा जमाल भी कम पड़ा।
तेरा हुस्न जिस से सँवारता मेरे हाथ में वो धनक न थी॥

फ़क़त इस लिये ही ऐ दोसतो मैं समझ न पाया जूनून को।
मेरे दिल में चाह तो थी मगर मेरी वहशतों में कसक न थी॥

ये चमन ही अपना  वुजूद है इसे छोड़ने की भी सोच मत
नहीं तो बताएँगे कल को क्या यहाँ गुल न थे कि महक न थी॥

मेरी और उस की उड़ान में कोई मेल है ही नहीं ‘नवीन’।
मुझे हर क़दम पै मलाल था और उसे कोई भी झिझक न थी॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाएलुन मुतफ़ाएलुन मुतफ़ाएलुन मुतफ़ाएलुन 
11212 11212 11212 11212 

1 comment:

  1. क्या बात है..

    बहुत खूब

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