26 February 2011

यूँ ही आँगन में बम नहीं आते

लुटके मंदिर से हम नहीं आते
मयकदे में कदम नहीं आते

कोई बच्चा कहीं कटा होगा
गोश्त यूँ ही नरम नहीं आते

आग दिल में नहीं लगी होती
अश्क इतने गरम नहीं आते

कोइ फिर भूखा सो गया होगा
यूँ ही जलसों में रम नहीं आते

प्रेम में गर यकीं हमें होता
इस जहाँ में धरम नहीं आते

कोई अपना ही बेवफ़ा होगा
यूँ ही आँगन में बम नहीं आते
धर्मेन्द्र कुमार सज्जन का कल्पना लोक


3 comments:

  1. तिलक राज जी का बहुत बहुत शुक्रिया और मेरी ग़ज़ल को इस मंच पर स्थान देने के लिए नवीन भाई को कोटिशः धन्यवाद।

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  2. इन दो अशारों ने मन मोह लिया भाई धर्मेन्द्रजी.
    //प्रेम में गर यकीं हमें होता
    इस जहाँ में धरम नहीं आते//
    सही है भाईजी, प्रेम ही अबसे बड़ा दायित्त्व निर्धारक है जिसके लिये धर्म एक व्यक्ति को तत्पर रहने ई बात करता है. इन उला और सानी पर बकायदा आलेख लिखा जा सकता है. मैं आपका सादर अभिनन्दन करता हूँ.

    //कोई अपना ही बेवफ़ा होगा
    यूँ ही आँगन में बम नहीं आते//
    वाह-वाह ! यदि घर में ही न होती मतिर्भिन्नता और न होता परस्पर क्लेष तो फिर सारा कुछ सँवरा हुआ ही था न ?!
    सादर

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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