नवगीत - प्रेम बंधक - सीमा अग्रवाल

 


प्रेम बंधक

फ़रतें आज़ाद ! 

कैसा दौर है यह !

 दाँत भींचे

आँख में चिंगारियाँ ले

हो रही निर्द्वन्द्व

दानवता

प्रार्थनारत

छटपटाती सी खड़ी है

निर्विकल्पी

विवश मानवता

 

शांति वर्जित,

चयन में उन्माद !

कैसा दौर है यह !

 

राम ईसा बुद्ध नानक खुदा

जैसे शब्द

अब हथियार हैं

घातक

मैत्रीसद्‌भावकरुणा के

समअर्थी सब

विषैले वार हैं

घातक

 

फफोलों पर

आग से संवाद !

कैसा दौर है यह !

 

श्रेष्ठतम हम ही’

प्रमादी घोष का यह काल,

काला है

बहुत काला

क्रूर अभिमानी निरंकुश

रोष का यह काल,

काला है

बहुत काला

 

कुतर्की

प्रतिवाद दर प्रतिवाद !

कैसा दौर है यह !

1 टिप्पणी:

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