प्रेम बंधक
फ़रतें आज़ाद !
कैसा दौर है यह !
दाँत भींचे
आँख में चिंगारियाँ ले
हो रही निर्द्वन्द्व
दानवता
प्रार्थनारत
छटपटाती सी खड़ी है
निर्विकल्पी
विवश मानवता
शांति वर्जित,
चयन में उन्माद !
कैसा दौर है यह !
राम ईसा बुद्ध नानक खुदा
जैसे शब्द
अब हथियार हैं
घातक
मैत्री, सद्भाव, करुणा के
समअर्थी सब
विषैले वार हैं
घातक
फफोलों पर
आग से संवाद !
कैसा दौर है यह !
‘श्रेष्ठतम हम
ही’
प्रमादी घोष का यह काल,
काला है
बहुत काला
क्रूर अभिमानी निरंकुश
रोष का यह काल,
काला है
बहुत काला
कुतर्की
प्रतिवाद दर प्रतिवाद !
कैसा दौर है यह !

बहुत सुंदर
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