अवधी लोकगीत – गवनवां हम कबहुँ न जइबे – कुसुम तिवारी ‘झल्ली’

 

सुनी ल हो बाबुल अर्जियां

गवनवां हम कबहुँ न जइबे

माई के कोरवा में रहिबे

गवनवां हम कबहुँ न जइबे

माई के अचरा में रहबै

गवनवां हम कबहुँ न जइबे

 बाबुल तू हमके काही बियाहे

बाबुल तू हमरा के काही बियाहे

सोन चिरैया हम कही उड़ाए

न पौबे अंगनवा में बाबुल

न पौबे अंगनवा में बाबुल

त ड्योढी पर ठिठका रही जइबे

सुनी ल हो बाबुल....

 

आई सावन त पीहर याद आये

आई सावन त पीहर याद आये

सावन का झूला के हमके झुलाये

करके करेजवा में सावन

अमरैया में छुप छुप के रौबे

सुनी ल हो बाबुल..

2 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर प्रस्तुति 👌💐❤️👍

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  2. अति सुन्दर प्रस्तुति है 👌
    आपका लॉयर गिरीश मिश्रा 🙏

    जवाब देंहटाएं

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