हिन्दी गजल - मैं मरुथल, वो सावन होता – पुष्पेन्द्र ‘पुष्प’

मैं मरुथल, वो सावन
होता
ये अनुपम संयोजन होता
उर में भाव उमड़ते रहते
आँखों से अनुमोदन
होता
उस पारस
की एक छुअन से
मुझसा लोहा कंचन होता
दग्ध
हृदय शीतल होता जब
सम्मुख वो चन्द्रानन होता
मेरी हर
कविता का, उसके
अधरों से संपादन होता
श्रमसीकर भी पूजे जाते
आँसू का
अभिवादन होता
'प्रिय' को 'प्राण' पुकारा
करते
तब
मधुरिम सम्बोधन होता
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी करने के लिए 3 विकल्प हैं.
1. गूगल खाते के साथ - इसके लिए आप को इस विकल्प को चुनने के बाद अपने लॉग इन आय डी पास वर्ड के साथ लॉग इन कर के टिप्पणी करने पर टिप्पणी के साथ आप का नाम और फोटो भी दिखाई पड़ेगा.
2. अनाम (एनोनिमस) - इस विकल्प का चयन करने पर आप की टिप्पणी बिना नाम और फोटो के साथ प्रकाशित हो जायेगी. आप चाहें तो टिप्पणी के अन्त में अपना नाम लिख सकते हैं.
3. नाम / URL - इस विकल्प के चयन करने पर आप से आप का नाम पूछा जायेगा. आप अपना नाम लिख दें (URL अनिवार्य नहीं है) उस के बाद टिप्पणी लिख कर पोस्ट (प्रकाशित) कर दें. आपका लिखा हुआ आपके नाम के साथ दिखाई पड़ेगा.
विविध भारतीय भाषाओं / बोलियों की विभिन्न विधाओं की सेवा के लिए हो रहे इस उपक्रम में आपका सहयोग वांछित है. सादर.