29 March 2014

पुस्तक समीक्षा - ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर (‘सज्जन’ धर्मेन्द्र) - ज़हीर कुरैशी

अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद के साहित्य सुलभ संस्करण की आठ काव्य पुस्तकों के लोकापर्ण के अवसर पर दिनांक 22 फ़रवरी, 2014 को मुख्य अतिथि की आसंदी से ग़ज़लकार ज़हीर कुरेशी (भोपाल) का वक्तव्य और पुस्तक समीक्षा

डॉ अख़्तर नज़्मी का एक शे’र है

बात करती हैं किताबें,
पढ़ने वाला कौन है।

न पढ़ने के कारणों पर जब डॉ. नज़्मी से चर्चा हो रही थी तो शायर ने साहित्य की पुस्तकें मँहगी होने को भी एक कारण गिनाया था।

बड़े प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह या कहानी की पुस्तक का मुल्य 400-500 रूपए से कम नहीं होता। ऐसे में साहित्य का सच्चा पाठक भी दस बार सोचता है। कई बार वह पुस्तक के अधिक मूल्य के कारण मन मसोस कर रह जाता है।

ऐसे बाजारवादी समय में, अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद की 112 पृष्ठों की कविता की पुस्तक 20 रूपए में उपलब्ध होना मरुस्थल में शीतल झरने की तरह है। वीनस केसरी के इस प्रयास की जितनी भी सराहना की जाय, उतनी कम है। साहित्य सुलभ संस्करण की 8 पुस्तकों के लोकार्पण के अवसर पर मैं उनको ढेरों बधाइयाँ देता हूँ और विमोचित पुस्तकों पर चर्चा शुरू करता हूँ।

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34 वर्षीय युवा ग़ज़लगो ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र का ग़ज़ल संग्रह ‘ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर’ भी पर्याप्त ध्यानाकर्षण करता है। ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र की ग़ज़ल यात्रा कोई बहुत लंबी नहीं है, इस संग्रह की ग़ज़लें वर्ष 2011 से वर्ष 2013 के बीच कही गई हैं। ग़ज़लों में भी परोक्ष रूप से उनके रोल मॉडल ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी हैं। उनके अनेक शे’र पढ़ते हुए अनायास अदम गोंडवी की याद आती है। जैसे

प्रियदर्शिनी करें तो उन्हें राजपाट दें,
रधिया करे निकाह तो दंगा कराइए।

गरीबों के लहू से जो महल अपने बनाता है
वही इस देश में मज़लूम लोगों का विधाता है।

ये मेरे देश की संसद या कोई घर है शीशे का,
जो बच्चों के भी पत्थर मारते ही टूट जाता है।

लेकिन ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र को इस कोण से देखना भर उनके ग़ज़लगो के साथ अन्याय होगा। जब वे अपनी शैली में शेरों को निकालते हैं तो चकित करते हैं। मसलन

सभी नदियों को पीने का यही अंजाम होता है,
समंदर तृप्ति देने में सदा नाकाम होता है।

नूर सूरज से छीन लेता है,
पेड़ यूँ ही हरा नहीं होता।

अंधविश्वासअशिक्षा यही घर घुसरापन,
है गरीबी इन्हीं पापों की सजा मान भी जा।

अपनी बात’ के अंतर्गत ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र एक बड़ी मार्के की बात कहते हैं - जब तक ग़ज़ल का पदार्पण हिन्दी भाषा में हुआ, तब तक हिन्दी की ज्यादातर कविता छंदमुक्त हो चुकी थी। दुष्यंत ने उसी छंदमुक्त और मुक्त-छंद कविता के कोलाहल में ‘साए में धूप’ की अंदर तक छू जाने वाली ग़ज़लों के बिरवे रोपे, जो कालान्तर में हिन्दी ग़ज़लकारों की मुस्तैद पीढ़ियों द्वारा खाद-पानी देने से कद्दावर वृक्षों में तब्दील हुए।

सज्जन’ धर्मेन्द्र की ग़ज़लों में नव्यता बोध के आग्रह के साथ भाव बोध और अनुभूतियों का एक ऐसा समन्वय है, जो शेरों के अर्थ को एक बड़े विस्तार में ध्वनित करता है।

धर्मेन्द्र के यहाँ वज़्न और बह्र की कुछ एक ख़ामियाँ दिखाई पड़ती हैं। उनको तीन वर्ष पुराने ग़ज़लगो होने के नाते नज़रअंदाज करते हुए, मैं उन्हें केवल एक ही सलाह देना चाहूँगा कि वे दुष्यंत और अदम की परंपरा एवं सोच से आगे निकलें।

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