4 May 2013

एक तीर से कर लिये..हमने तीन शिकार - आदिक भारती

दो ही पल के दर्द में..हम हो गये निढाल
तू कैसे हँसता रहा..दुख में सालों-साल

जब विपदा की रैन में..छोड़ गये सब साथ
मुझको सहलाते रहे..जाने किसके हाथ

चादर से बाहर हुए..जब से अपने पाँव
कंधों-कंधों धूप है..घुटनों-घुटनों छाँव

कवि बनकर हासिल हुए..यश दौलत सत्कार
एक तीर से कर लिये..हमने तीन शिकार
युग बदले, बदले नहीं-निर्धन के हालात
आज तलक भी ढाक के..वही तीन हैं पात

मुख दमके आह्लाद में..कभी दुःख में माँद
जाने किसके इश्क़ में..दीवाना है चाँद

इस दिल की दीवानगी..करे तमाशा ख़ूब
मैं दर्पण के सामने..दर्पण में महबूब

इक उजली इक साँवली..लेकिन गुण अनुरूप
ओस निशा दोनों सखी..छुपें देखकर धूप

तीक्ष्ण बाण-सा भेदती..कई दिलों के मर्म
यूँ कहने को है ग़ज़ल..कमल-नाभ सी नर्म

सकुचाये बोझिल नयन..सहमी-सिमटी चाल
लाज-हया ने डाल दी.यौवन को वरमाल
:- आदिक भारती

आदिक साहब! ग़ज़ब के दोहे हैं..... मज़ा आया पोस्ट कर के। आप से दूसरी किश्त की फरमाइश अभी से की जा रही है। आशा है आप निराश नहीं करेंगे।

6 comments:

  1. सही है ..
    सुंदर प्रस्‍तुति !!

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  2. अद्भुत...बिल्कुल अलग हट कर दोहे!!

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  3. बढ़िया प्रस्तुति |
    आशा

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  4. संगे-ख़ार मनक्कस बसर पै घसे तीर..,
    कजे-अब्र ब-रफ़्तार नज़र पै कसे तीर..,
    कजअदा दिलरुबा किस अदा से चलाए..,
    चाक करके चीर के जीगर पै धँसे तीर.....

    संगे-ख़ार= एक तरह का कडा पत्थर
    संगे-मनक्कश= तराश कर
    सगे-बसर= बसरी में पाया जानेवाला एक पत्थर
    कजे-अब्र = तिर्यक भृकुटी
    कजे-रफ़्तार= कुटिल गति से चलने वाले
    कज-अदा= बेमुरव्वत, बेवफ़ा

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  5. wah ! maza aa gaya padh kar...bahut sundar prastuti

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