9 October 2010

अपनी ख़ुशबू तो बिखरनी थी गुलाबों की तरह - नवीन

नया काम :




अपनी ख़ुशबू तो बिखरनी थी गुलाबों की तरह।
पर बुझा डाला गया हम को चराग़ों की तरह॥

एक झटके में हवाओं ने हमें खींच लिया।
गिरते झरनों से बिछड़ती हुई बूँदों की तरह॥

बोलते सब हैं मगर हम को पढा है किसने।
सिर्फ़ छापा है उसूलों की किताबों की तरह॥

अच्छे-अच्छों ने कहा कृष्ण की मुरली हैं हम।
किन्तु समझा हमें ढप-ढोल-नगाड़ों की तरह॥

यों अगर देखें तो कुछ भी तो न कर पाये हम।
चहचहा भी तो नहीं पाए परिन्दों की तरह॥





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जिस ने इस दिल को खिलाना था गुलाबों की तरह
उस ने ही दिल को बुझा डाला चिराग़ों की तरह।१।

मैंने देखा है ज़माने को तेरी नज़रों से।
तेरी यादें हैं मेरे दिल में क़िताबों की तरह।२।

मन की धरती पे ख़यालों की उगी घास, उस पर।
तेरा एहसास लगे शबनमी बूंदों की तरह।३।

तेरी ख़ामोशी कभी लगती है सन्नाटे सी।
तो कभी लगती है ढप-ढोल-नगाड़ों की तरह।४।


बहरे रमल मुसम्मन मखबून मुसक्कन
फाएलातुन फ़एलातुन फ़एलातुन फालुन 
२१२२ ११२२ ११२२ २२

अपने एक गायक मित्र के लिये कही गयी इस ग़ज़ल में क़ाफ़िया 'ओं' है

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