दिवे पाण्यामधे सोडायचे आता
उशाला स्वप्न जर झोपून गेले
तर
कशाला रात्रभर जागायचे आता
नदी मागे पहाया लागली आहे
किनाऱ्याने कसे वागायचे आता
तुझे रस्ते, तुझी
वळणे, तुझी स्वप्ने
तुझ्या मागे किती धावायचे
आता
निराकारात जर परिपूर्णता आहे
घणाचे घाव का सोसायचे आता
तुझ्या माझ्यात जे राहून
गेले ते
तुझ्या शेरांमधे वाचायचे आता
उजेडाच्या दिशेची वाटते भीती
किती रात्री अजुन चालायचे
आता

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