गीत - सूझें कहीं न राहें, भ्रम जाल है बिछाता - रश्मि शुक्ल 'किरण'

  

सूझें कहीं न राहें, भ्रम जाल है बिछाता

हो कर घना बहुत ही, ये कोहरा डराता

 देता नहीं दिखाई, राहें रुकीं हुई हैं

घेरे तुषार बैठा, कलियाँ छुपी हुई हैं

छाया हुआ कुहासा, ओझल सभी नजारे

संत्रास दें हवाएं, दुबके सजीव सारे

झर-झर तुहिन धरा पर, सबको बड़ा सताता

हो कर घना बहुत ही, ये कोहरा डराता

 

हैं मौन आज पादप, कलरव न गूँजता है

आदित्य खो गये हैं, या धूप लापता है

जुगनू समान चमके, हैं सूर्य देवता जी

सुन लो विनय हमारी, ये बाल टेरता जी

नीहार के कहर से, है कौन अब बचाता

हो कर घना बहुत ही, ये कोहरा डराता

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