डॉ. धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘अंधा युग’ (१९५३ ई.) हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रभावशाली काव्य-नाटक है। ‘अंधा युग’ का कथास्रोत महाभारत है।
महाभारत युद्ध के बाद की घटनाएँ ही इसकी मूल
कथावस्तु हैं। इस कृति की घटनाओं का काल-आयाम महाभारत के १८वें दिन की संध्या से लेकर
श्रीकृष्ण की मृत्यु तक विस्तृत है। नाटक के प्रमुख पात्र महाभारत काल से लिए गए हैं-
कृष्ण, गांधारी,
धृतराष्ट्र, अश्वत्थामा, संजय, विदुर, युयुत्सु,
कृपाचार्य, कृतवर्मा, बलराम,
व्यास तथा कुछ सहायक पात्र- भिखारी, गूंगा,
वृद्ध, याचक, प्रहरी आदि।
नाटक की कथावस्तु युद्धोत्तर भारत की नैतिक विडंबना, मनुष्य की टूटती चेतना और मूल्यों के संकट को उजागर करती है। ‘अंधा युग’ हर युग के मनुष्य को अपने आंतरिक अंधेपन को पहचानने, समझने और उसके दुष्परिणामों से सावधान रहने का संदेश देता है। यहाँ अंधापन अज्ञान, नैतिक दुर्बलता, अव्यवस्था और सभ्यता के पतन का प्रतीक है।
धर्मवीर भारती द्वारा ‘अंधा युग’ नाटक क्यों लिखा गया स्वयं से प्रश्न करने पर ज्ञात होता है कि इसके दो ही आधार हो सकते हैं, पहला- द्वितीय महायुद्ध, दूसरा- आजादी का मोहभंग जब वर्तमान समय में मनुष्य की आस्था खंडित होती है, तब उसे पुनः स्थापित करने के लिए मिथक की ओर लौटने की कोशिश रचनाकारों में दिखाई देती है। यही जिम्मेदारी भारती जी ने अपने कन्धों पर ली, मिथक के द्वारा संस्कृति नवीकरण का सपना देखा। द्वितीय महायुद्ध के संत्रास से पीड़ित पीढ़ी के अनुभव और सोच को अभिव्यक्त करने के लिए भारती जी ने महाभारत के अंतिम भाग को अपने काव्यनाटक को कथानक का आधार बनाया है। इस कृति में व्यक्ति ही नहीं मानवीय स्थिति की दुखांत घटना भी है।
इसमें महाभारत के कथानक की नई मौलिक वैचारिक और सैद्धांतिक संकल्पनाएँ की गई हैं और उनको नये युग सापेक्ष संबंधो में देखा गया है। आजादी के बाद का सत्ता संघर्ष, भ्रष्टाचार, मूल्यांधता और आम आदमी का मोहभंग 'अंधा युग' का सामयिक संदर्भ है। चरित्रों के माध्यम से जीवन की विभिन्न संदृष्टियों को व्यक्त करते हुए विराट जीवन की झाँकी प्रस्तुत करना भारती जी की महती प्रतिभा का प्रमाण है। घोर अव्यवस्था, मूल्यहीनता और अंधकार के बीच विदुर, वृद्ध व्याध और कृष्ण के माध्यम से मानवीय आस्था को वाणी दी गई है। इस कृति में अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र- परमाणु संहार का, संजय की तटस्थता- भारतीय विदेशनीति का और युधिष्ठिर की आत्म-ग्लानि में स्वातंत्र्योत्तर गाँधी की छाप का आभास मिलता है।
'अंधा युग' काव्यनाटक का आरंभ मंगलाचरण और उद्घोषणा से होता है। पहले अंक का आरंभ कथा गायन से होता है और पाठकों को उन प्रश्नों का संकेत मिल जाता है जो इस काव्यनाटक की रचना के आधार हैं। 'अंधा युग' के पहले अंक में पूर्व-कथा का ज्ञान होता है और संजय द्वारा दिखलाये जाने वाले युद्ध समाचार में जिज्ञासा है। दूसरे अंक में अश्वत्थामा के स्वालाप से उसकी कुंठा और संत्रास का पता चलता है। वृद्ध की हत्या से कार्यव्यापार में सघनता आती है। तीसरे अंक में दैत्याकर योद्धा का मायावी रूप, युयुत्सु-गांधारी प्रसंग की विडंबना, गूँगे सैनिक का प्रसंग, दुर्योधन और भीम के द्वंद्व युद्ध के परिणाम के प्रति दर्शक-पाठक में जिज्ञासा का संचार होता है। अश्वत्थामा द्वारा अर्द्ध-सत्य की प्राप्ति तथा उसकी प्रतिशोध-प्रतिज्ञा के साथ नाटक अपने चरम पर पहुँचता है। अंतराल में प्रेतलोक सा वातावरण है। चौथे अंक के आरंभ में गांधारी के पाषाण रूप से दर्शक प्रभावित होता है। अश्वत्थामा और अर्जुन के ब्रह्मणास्त्र युद्ध से क्रिया व्यापार में तीव्रता लक्षित होती है। दुर्योधन के कंकाल तथा अश्वत्थामा के प्रति कृष्ण के अन्याय के विरुद्ध गांधारी के शाप के साथ नाटक का कार्य व्यापार तीव्र हो उठता है। कृष्ण द्वारा गांधारी के शाप को शांत भाव से स्वीकार करना पाठक मन में कृष्ण के प्रति उदात्त भावना को खंडित होने से बचाता है। पाँचवा अंक युधिष्ठिर की चिंता, तत्कालीन राजनीतिक स्थिति का वर्णन, युयुत्सु का, धृतराष्ट्र तथा गांधारी का आत्मदाह इत्यादि सभी प्रसंग लगभग वर्णनात्मक हैं। समापन में प्रभु की मृत्यु होती है। युयुत्सु और अश्वत्थामा की परिणति क्या होगी इस प्रश्न को गंभीरता से उठाया गया है।
'अंधा युग' नाटक में महाभारत की त्रासदी को दूसरे विश्वयुद्ध के संदर्भ में देखा जाए तो, इस कृति में विश्वयुद्ध के बाद की निराशा और मानवीय आस्था की खंडित अनुभूति को देखना उचित होगा। साथ ही स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद की भारतीय परिस्थितियों को भी दृष्टि में रखना होगा। इसका प्रत्येक पात्र हमारे तत्कालीन समाज की किसी न किसी प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
‘अंधा युग’ का रचना काल १९५३ ई है। द्वितीय विश्वयुद्ध (१९३९-१९४५) में हुए भीषण नरसंहार, मूल्यों के अपघटन, रक्तपाद, विध्वंस ने लेखक के हृदय को आघात पहुंचाया। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक स्तर पर लेखक ने इस पीड़ा को महसूस किया। जिसमें तृतीय विश्वयुद्ध का भय छिपा हुआ था। जिसमें सबसे चिंताजनक मानव मूल्यों का ह्रास था। मानव का मर्यादाहीन होकर पशुवत व्यवहार करना संसार का अंत करने के लिए काफी हो सकता था।
विश्व समाजवादी तथा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की दो प्रतिनिधि राष्ट्रों रूस और अमेरिका में बँटा हुआ था किसी भी समय युद्ध छिड़ सकता था। अतः महाभारत और द्वितीय विश्वयुद्ध की स्थिति में एक समानता थी दोनों ही स्थितियां बहुत भयावह थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के साथ ही विषम परिस्थितियों का भी जन्म हुआ। विज्ञान तथा भौतिकवादी दृष्टि के कारण सनातन जीवन मूल्यों का टूटना, आर्थिक मंदी, अभाव तथा राजनीतिक उथल-पुथल के कारण कुछ अस्तित्ववाद दर्शन से मनुष्य निराश, आस्थाहीन और किंककर्तव्यमूढ हो गए, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार महाभारत के बाद की युद्ध की स्थिति थी। जिस प्रकार हर जगह केवल त्राहि-त्राहि मची हुई थी। जहां तक नजर जाती विनाश ही विनाश दिखाई पड़ता।
युद्ध का परिणाम सदैव ही हानिकारक व पीड़ादायी होता है। यही सीख ‘अंधा युग’ में वर्णित महाभारत के १८वें दिन की संध्या बेला से लेकर प्रभु की मृत्यु तक में हमें मिलता है। इसमें न तो कोई पक्ष जीतता है न कोई हारता है, हर जगह संपूर्ण विनाश होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सभी राष्ट्र दुखी थे। जीतने वाला अमेरिका तथा रूस भी ..... और हारने वाला जर्मनी भी। कुछ ऐसा ही हाल महाभारत के युद्ध में कौरवों और पांडवों का देखने को मिलता है। सब का अंत पीड़ादायक होता है। अंत में सबको अनन्य पीड़ा के साथ देह त्याग करना पड़ता है। जिसे लेखक ने त्रासदी के माध्यम से व्यक्त किया है। हमारे सामने जो युद्धों के अवशेष पड़े हैं बराबर याद दिलाते रहेंगे कि हमें कैसे जीना है ।
लेखक इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं कि आखिर युद्ध का परिणाम क्या होता है और कौन विजय प्राप्त करता है ?... जय तो होती है किंतु- अविवेक की, अर्धसत्य की, बर्बरता की, और.... पराजय होती है- विवेक की, शांति की, सत्य की। युद्ध का परिणाम केवल निराशा ही होता है ।
उससे भी बड़ा सत्य है कि युद्ध कितना भी बड़ा क्यों ना हो वह मनुष्य के अंदर निहित है। मनुष्य चाहे तो एक छोटे से विचार को बदलकर बड़े से बड़े युद्ध को रोक सकता है ...किंतु वह अपने अहं की पुष्टि के लिए ऐसा नहीं करता। अतः सर्वप्रथम हमें अपने विचारों में परिवर्तन की आवश्यकता है ताकि युद्ध खत्म किए जा सकें ।
१९४७ में जब देश आजाद हुआ, तो यह प्रश्न था कि देश किस ओर आगे बढ़े? ‘अंधा युग’ की चिंता भी यही है ... जिसमें वह कौरवों पांडवों को दो मार्गों के रूप में देखता है। वे दो मार्ग पूंजीवाद व समाजवाद के रूप में सामने आते हैं, लेकिन दोनों की अपनी सीमाएं हैं। दोनों पक्ष अपने ही को सही तथा दूसरे को गलत बताते हैं लेकिन ‘अंधा युग’ के अनुसार दोनों तरफ अर्धसत्य है। जीवन मूल्यों की टकराहट कौन सा मार्ग अच्छा है यह तय कर पाना मुश्किल है। लेखक की चिंता मानव मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा है और उसके द्वारा सुझाए गए समाधान भी उचित हैं।
लेखक मानता है कि प्रभु की मृत्यु नहीं हुई हैं। केवल रूपांतर हुआ है। वह अन्य रूपों में अपना दायित्व निभाएंगे, वे आत्मा के रूपों में अपना दायित्व निभाएंगे, आत्मा के रूप में प्रत्येक व्यक्ति का नेतृत्व करेंगे। मानव जाति का भविष्य भी उन्हीं लोगों के हाथों में सुरक्षित रहेगा ... जो कृष्ण की तरह औरों के पापों का प्रायश्चित अपने सिर पर लेने की इच्छा रखने वाले होंगे। ‘अंधा युग’ का लेखक मानता है कि नियति पूर्व निर्धारित नहीं होती, मानव के निर्णय, उसके कर्म उसे हमेशा बनाते वह मिटाते रहते हैं। वहीं उनका सृजनकर्ता है और वही अपना भविष्य निर्माता है।

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