ग़ज़ल - कहें क्या हुआ हमको क्या रफ़्ता-रफ़्ता – डॉ. अनिषा अंगरा ‘अंगिरा’

 

कहें क्या हुआ हमको क्या रफ़्ता-रफ़्ता

हुए इश्क़ में मुब्तिला रफ़्ता-रफ़्ता

 

नज़र उनकी उतरी यूं दिल में हमारे

ख़ला दिल का भरता गया रफ़्ता-रफ़्ता

 लो छूने की हमने तुम्हें दी इजाज़त

मगर शर्त ये है ज़रा रफ़्ता-रफ़्ता

 

बने जब मरासिम मेरे आपसे तब

बना ख़ुद से भी राबता रफ़्ता-रफ़्ता

 

भरा ज़ीस्त में इश्क़ ने जब तरन्नुम

हुए हम भी नग़्मा-सरा रफ़्ता-रफ़्ता

 

नज़र उन पे जाकर ही क्यों टिक रही है

समझ आया ये माजरा रफ़्ता-रफ़्ता

 

नशा इश्क़ का सर पे तारी हुआ यूं

लगी झूमने "अंगिरा" रफ़्ता-रफ़्ता

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