कहें क्या हुआ हमको क्या रफ़्ता-रफ़्ता
हुए इश्क़ में मुब्तिला रफ़्ता-रफ़्ता
नज़र उनकी उतरी यूं दिल में हमारे
ख़ला दिल का भरता गया रफ़्ता-रफ़्ता
मगर शर्त ये है ज़रा रफ़्ता-रफ़्ता
बने जब मरासिम मेरे आपसे तब
बना ख़ुद से भी राबता रफ़्ता-रफ़्ता
भरा ज़ीस्त में इश्क़ ने जब तरन्नुम
हुए हम भी नग़्मा-सरा रफ़्ता-रफ़्ता
नज़र उन पे जाकर ही क्यों टिक रही है
समझ आया ये माजरा रफ़्ता-रफ़्ता
नशा इश्क़ का सर पे तारी हुआ यूं
लगी झूमने "अंगिरा" रफ़्ता-रफ़्ता

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