ग़ज़ल - इन निगाहों पे मुहब्बत में है इल्ज़ाम बहुत - अर्चना वर्मा सिंह

 

इन निगाहों पे मुहब्बत में हैं इल्ज़ाम बहुत
बेसबब दिल को ये देती रहीं पैग़ाम बहुत
 
दिल-ए-नादाँ जो कभी करता नहीं उल्फ़त तो
ज़िन्दगी में नहीं होते कभी कोहराम बहुत

दिल जिसे भूलना चाहे है मेरा जाने क्यों
याद आता है वही शख़्स सरे-शाम बहुत
 
फिर भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा मैंने
ज़िन्दगी में हुआ हूँ वैसे तो नाकाम बहुत
 
‘अर्चना’ अब तो भलाई का करो काम कोई
अब तलक तो किए हैं तुमने बुरे काम बहुत

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