ग़ज़ल - उसने तुमको क्या कुछ दे के नवाज़ा है – मधु ‘मधुमन’

 

उसने तुमको क्या कुछ दे के नवाज़ा है

क्या तुमको इस बात का कुछ अंदाज़ा है

 

हासिल है हर चीज़ न जाने क्यूँ फिर भी

सबके लबों पर कोई न कोई तक़ाज़ा है

 साथ नहीं है आज हमारे कोई अगर

ये शायद सच कहने का ख़म्याज़ा है

 

रूह पे मैल चढ़ी है जन्मों जन्मों की

रुख़ पर लेकिन सबके मन भर ग़ाज़ा है

 

दरवाज़ा खोला तो ये मालूम हुआ

दरवाज़े के बाद भी इक दरवाज़ा है

 

ये जो है बिखराव मेरे अल्फ़ाज़ में ना

मेरे टूटे ख़्वाबों का शीराज़ा है

 

कैसे लिक्खें शे’र तरब के “मधुमन” हम

ज़ख़्म हमारे दिल का अभी तो ताज़ा है

 

ग़ाज़ा - पाउडर

शीराज़ा-बाइंडिंग ऑफ बुक

तरब- हॅपीनेस

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