हिन्दी गजल - भीड़ दुखों की पल-पल भारी रहती है – डॉ. दमयन्ती शर्मा ‘दीपा’

 


 भीड़ दुखों की पल-पल भारी रहती है
जीवन है सो मारा-मारी रहती है
 
बोल पिता के काँटे जैसे हैं तो क्या
मन में तो सुरभित फुलवारी रहती है
 
जो बेटे सीमा की रक्षा करते हैं
भारत माँ उन पर बलिहारी रहती है
 
बस नवरात्रों में ही तुमसे क्या माँगूँ
मुझपर निशिदिन कृपा तुम्हारी रहती है
 
दीवाली को तो मत जाओ कार्यालय
इस दिन तो छुट्टी सरकारी रहती है
 
नित्य परीक्षा देकर ही 'दीपा' जीती
दुख में भी वह कब दुखियारी रहती है

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