न पौरुष और न ही पुरुषार्थ
समझा
परम् समझा न तू परमार्थ समझा
परम् समझा न तू परमार्थ समझा
न समझा तन का अपने कार्य तूने
न अपनी आत्मा का स्वार्थ समझा
न अपनी आत्मा का स्वार्थ समझा
बता क्या सच में तू शब्दार्थ समझा
जो उलझाता है क्या शास्त्रार्थ समझा
अधम कोई कहाँ धर्मार्थ समझा

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